top
72 साल की महिला को अदालत पहुंचना मुश्किल तो वीडियो कांफ्रेंसिंग से दे सकेंगी गवाही, हरियाणा हाईकोर्ट ने रास्ता साफ किया
चंडीगढ़. उम्र और शारीरिक असमर्थता के कारण यदि कोई गवाह अदालत तक पहुंचने की स्थिति में नहीं है तो उसे केवल इस वजह से न्यायिक प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जा सकता. पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 72 वर्षीय महिला की वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से साक्ष्य दर्ज कराने की मांग से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि ऐसी परिस्थितियों के लिए हाईकोर्ट के वीडियो कांफ्रेंसिंग नियमों में पहले से प्रावधान मौजूद हैं. अदालत ने निचली अदालत द्वारा आवेदन खारिज किए जाने का आदेश रद्द कर दिया और महिला को आवश्यक दस्तावेजों के साथ नए सिरे से आवेदन प्रस्तुत करने की अनुमति दी. न्यायमूर्ति दीपिंदर सिंह नलवा ने 27 अगस्त 2026 को डालजीतिंदर कौर उर्फ डालजीत इंदर अरोड़ा बनाम अमरिंदर सिंह बराड़ एवं अन्य मामले में यह फैसला सुनाया. मामला निचली अदालत के 3 जुलाई 2026 के आदेश के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका से संबंधित था. याचिकाकर्ता ने अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपनी गवाही दर्ज कराने के बजाय वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से साक्ष्य दर्ज करने की अनुमति मांगी थी. निचली अदालत ने उस समय यह कहते हुए आवेदन स्वीकार नहीं किया था कि महिला ने अपनी शारीरिक स्थिति के संबंध में मेडिकल प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया है. हाईकोर्ट के सामने सुनवाई के दौरान महिला की उम्र करीब 72 वर्ष बताई गई. उनके अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि वह गठिया की समस्या से पीड़ित हैं और चिकित्सकों ने उन्हें घुटना प्रत्यारोपण कराने की सलाह दी है. इस स्थिति को प्रमाणित करने वाला मेडिकल प्रमाणपत्र पुनरीक्षण याचिका के साथ हाईकोर्ट के रिकॉर्ड पर रखा गया. इसके बाद अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या केवल आवेदन के समय मेडिकल प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं होने के आधार पर वीडियो कांफ्रेंसिंग से गवाही देने की मांग को खारिज किया जा सकता है. हाईकोर्ट ने अपने वीडियो कांफ्रेंसिंग नियमों के प्रावधानों पर ध्यान दिया. नियम 8.15 में ऐसी परिस्थितियों के लिए व्यवस्था की गई है, जब किसी आवश्यक व्यक्ति के लिए बीमारी या शारीरिक असमर्थता के कारण अदालत तक पहुंचना संभव न हो. इसके अलावा यदि संबंधित व्यक्ति की उपस्थिति सुनिश्चित करने में अनावश्यक देरी या अत्यधिक खर्च की स्थिति पैदा होती है, तब भी निर्धारित प्रक्रिया के तहत वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से उसकी उपस्थिति और साक्ष्य दर्ज करने की अनुमति दी जा सकती है. अदालत ने माना कि नियमों में जब पहले से ही ऐसी परिस्थितियों के लिए व्यवस्था मौजूद है तो केवल मेडिकल प्रमाणपत्र आवेदन के समय प्रस्तुत नहीं किए जाने को आधार बनाकर राहत से इनकार करना उचित नहीं था. हाईकोर्ट ने इस बात को भी रेखांकित किया कि वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से साक्ष्य दर्ज करना कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जिसमें न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता से समझौता हो. नियमों में यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय किए गए हैं कि दूरस्थ माध्यम से दर्ज की गई गवाही भी न्यायालय के रिकॉर्ड का विश्वसनीय हिस्सा बन सके. वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से गवाही की प्रक्रिया में संबंधित व्यक्ति की पहचान सुनिश्चित करने, शपथ दिलाने, गवाही के दौरान होने वाली आपत्तियों को रिकॉर्ड करने और पूरी कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखने जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं. गवाही का हस्ताक्षरित प्रतिलेख भी न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया जाता है. यानी तकनीक का इस्तेमाल केवल सुविधा के लिए नहीं, बल्कि निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया और आवश्यक सुरक्षा उपायों के साथ किया जाना है. हाईकोर्ट ने इसी आधार पर निचली अदालत के 3 जुलाई के आदेश को रद्द कर दिया. हालांकि अदालत ने खुद महिला को तत्काल वीडियो कांफ्रेंसिंग से गवाही दर्ज कराने की अंतिम अनुमति नहीं दी. इसके बजाय उसे सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ नए सिरे से आवेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी गई. इसमें लागू वीडियो कांफ्रेंसिंग नियमों के साथ मेडिकल रिकॉर्ड भी शामिल करने को कहा गया है. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने हाईकोर्ट को आश्वासन दिया कि नया आवेदन दो सप्ताह के भीतर निचली अदालत में दाखिल कर दिया जाएगा. हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि ऐसा आवेदन प्रस्तुत किया जाता है तो ट्रायल कोर्ट उसे कानून के अनुसार नए सिरे से विचार करेगा. इस दौरान वीडियो कांफ्रेंसिंग से संबंधित लागू नियमों और विशेष रूप से परीक्षा या गवाही दर्ज कराने से जुड़े प्रावधानों के साथ महिला की उम्र और चिकित्सकीय स्थिति को भी ध्यान में रखा जाएगा. हाईकोर्ट ने साथ ही यह स्पष्ट किया कि उसने नए आवेदन के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की है. यानी निचली अदालत को महिला के नए आवेदन पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेना होगा. हाईकोर्ट का फैसला केवल इस बात तक सीमित है कि पहले आवेदन को जिस आधार पर खारिज किया गया था, वह पर्याप्त नहीं था और नियमों में शारीरिक असमर्थता की स्थिति में वीडियो कांफ्रेंसिंग का रास्ता उपलब्ध है. यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में तकनीक की बढ़ती भूमिका को भी रेखांकित करता है. अदालत तक पहुंच न्याय पाने की मूल आवश्यकता है, लेकिन उम्र, बीमारी या शारीरिक असमर्थता के कारण किसी व्यक्ति के लिए न्यायालय परिसर तक पहुंचना कठिन हो सकता है. ऐसे मामलों में यदि गवाही दर्ज कराने के लिए केवल व्यक्तिगत उपस्थिति पर जोर दिया जाए तो मुकदमे की प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबी हो सकती है. वीडियो कांफ्रेंसिंग ऐसी परिस्थितियों में न्यायिक प्रक्रिया और व्यक्ति की वास्तविक स्थिति के बीच संतुलन बनाने का माध्यम बन सकती है. खास तौर पर गवाहों के मामलों में यह व्यवस्था महत्वपूर्ण हो सकती है. किसी बुजुर्ग, गंभीर रूप से बीमार या शारीरिक रूप से चलने-फिरने में असमर्थ व्यक्ति को केवल गवाही देने के लिए लंबी दूरी तय करके अदालत तक लाना कई बार उसके लिए कठिन और महंगा हो सकता है. यदि नियमों के तहत उसके स्थान से ही साक्ष्य दर्ज किया जा सके तो न्यायिक प्रक्रिया जारी रखते हुए उसकी परेशानी को भी कम किया जा सकता है. हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी संकेत दिया है कि वीडियो कांफ्रेंसिंग का इस्तेमाल स्वतः अधिकार के रूप में नहीं, बल्कि नियमों और परिस्थितियों के अनुरूप किया जाएगा. संबंधित अदालत को यह देखना होगा कि शारीरिक असमर्थता वास्तविक है या नहीं और उपलब्ध दस्तावेज उसकी पुष्टि करते हैं या नहीं. साथ ही गवाही की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए निर्धारित प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन भी जरूरी होगा. इस मामले में महत्वपूर्ण बात यह रही कि निचली अदालत के आदेश को रद्द करने के बावजूद हाईकोर्ट ने मुकदमे के मूल विवाद पर कोई फैसला नहीं दिया. उसने केवल गवाही दर्ज कराने के माध्यम से जुड़े प्रश्न पर यह स्पष्ट किया कि बीमारी या शारीरिक असमर्थता वाले व्यक्ति के लिए वीडियो कांफ्रेंसिंग नियमों के तहत न्यायालय के पास वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध है. फैसले का व्यापक संदेश यही है कि न्याय तक पहुंच केवल अदालत भवन तक पहुंचने का नाम नहीं है. बदलती तकनीक ने न्यायिक प्रक्रिया में ऐसे रास्ते उपलब्ध कराए हैं, जिनसे विशेष परिस्थितियों में व्यक्ति की उपस्थिति दूरस्थ माध्यम से सुनिश्चित की जा सकती है. पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की यह टिप्पणी बुजुर्ग और शारीरिक रूप से असमर्थ गवाहों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि उचित परिस्थितियों और निर्धारित प्रक्रिया के तहत उनकी गवाही अदालत तक उन्हें शारीरिक रूप से लाए बिना भी दर्ज की जा सकती है.
Read full article on Palpal India