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अमेरिका में H-1B वीजा पर बड़ा झटका: $100,000 की भारी फीस सितंबर 2027 तक बरकरार, भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स पर टूटा संकट

📰 Ni News India 🕐 1 min read 📅 September 19, 2026 👁 1 views
अमेरिका में H-1B वीजा पर बड़ा झटका: $100,000 की भारी फीस सितंबर 2027 तक बरकरार, भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स पर टूटा संकट
अमेरिका में नौकरी करने का सपना देखने वाले भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों, सॉफ्टवेयर इंजीनियरों और आईटी प्रोफेशनल्स के लिए व्हाइट हाउस से एक बड़ा और चिंताजनक फैसला सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B वीजा नियमों पर लगाए गए कड़े वित्तीय और विनियामक प्रतिबंधों की समयसीमा को एक और साल के लिए बढ़ाकर सितंबर 2027 तक लागू रखने का आधिकारिक फैसला लिया है। इस कड़े आव्रजन निर्देश के तहत अमेरिका में काम करने के इच्छुक विदेशी पेशेवरों की नियोक्ता कंपनियों को अब प्रति याचिका 100,000 डॉलर (लगभग 83 से 85 लाख रुपये) का भारी-भरकम अनिवार्य शुल्क अदा करना होगा। व्हाइट हाउस की ओर से जारी ताजा अधिसूचना के मुताबिक, सितंबर 2025 में अस्थायी रूप से लागू किए गए ये कठोर नियम अब 21 सितंबर 2027 तक प्रभावी रहेंगे। अमेरिकी प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों का तर्क है कि घरेलू तकनीकी श्रम बाजार में स्थानीय कामगारों के हितों की स्थिति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है, और वीजा सिस्टम के कथित दुरुपयोग को रोकने के लिए इस वित्तीय अवरोध को जारी रखना अनिवार्य हो गया है। नए वीजा नियम के कड़े प्रावधान: 21 सितंबर 2026 के बाद यूएस यात्रा करने वालों पर कड़ा पहरा नए प्रशासनिक निर्देश के अनुसार, इस नियम के दायरे में आने वाले कोई भी विदेशी कर्मचारी तब तक अमेरिकी सीमा में प्रवेश नहीं कर सकते जब तक कि उनके प्रायोजक नियोक्ताओं द्वारा दायर याचिका में 100,000 डॉलर के इस विशेष अनिवार्य शुल्क का पूरा भुगतान शामिल न हो। यह शर्त विशेष रूप से उन विदेशी कर्मचारियों पर लागू की गई है जो वर्तमान में अमेरिका की सीमाओं से बाहर स्थित हैं और 21 सितंबर 2026 के बाद काम के सिलसिले में अमेरिका में प्रवेश करने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, इस व्यवस्था में राष्ट्रीय सुरक्षा और आपातकालीन संतुलन बनाए रखने के लिए होमलैंड सिक्योरिटी सचिव को कुछ विवेकाधीन अधिकार दिए गए हैं। होमलैंड सिक्योरिटी सचिव किसी विशेष व्यक्तिगत कर्मचारी, किसी कॉरपोरेट संस्थान के पूरे कार्यबल या किसी विशिष्ट वाणिज्यिक क्षेत्र को इस 100,000 डॉलर की लेवी से छूट दे सकते हैं, बशर्ते यह आधिकारिक तौर पर प्रमाणित किया जाए कि संबंधित विदेशी विशेषज्ञ का अमेरिका में रोजगार पाना देश के राष्ट्रीय हितों के लिए अपरिहार्य है और इससे अमेरिका की आंतरिक सुरक्षा या आर्थिक कल्याण को कोई खतरा नहीं पहुंचेगा। आईटी आउटसोर्सिंग और थर्ड-पार्टी एजेंसियों पर कार्रवाई: घरेलू कामगारों के विस्थापन का आरोप ट्रंप प्रशासन का सीधा आरोप है कि लंबे समय से थर्ड-पार्टी स्टाफिंग एजेंसियों और आईटी आउटसोर्सिंग सेवा प्रदाताओं ने अमेरिकी कामगारों को दरकिनार कर सस्ते विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करने के लिए H-1B वीजा कार्यक्रम की खामियों का दुरुपयोग किया है। सरकार की ओर से जारी बयान में यह स्पष्ट किया गया कि साल 2025 की घोषणा में भी रेखांकित किया गया था कि H-1B वीजा का मूल उद्देश्य अमेरिका में उच्च-कुशल और अति-विशिष्ट कार्यों के लिए अस्थायी तकनीकी प्रतिभाओं को आकर्षित करना था। इसके विपरीत, कई स्टाफिंग फर्मों ने कम वेतन वाले विदेशी कामगारों को लाकर अमेरिकी कर्मचारियों को विस्थापित करने का जरिया बना लिया। आधिकारिक जांचों में पाया गया कि ये आउटसोर्सिंग फर्में भारी संख्या में शुरुआती स्तर (एंट्री-लेवल) के H-1B कर्मचारियों की आपूर्ति कर रही थीं, जिन्हें पारंपरिक पूर्णकालिक अमेरिकी कर्मियों के मुकाबले काफी कम पारिश्रमिक दिया जाता था। इस प्रवृत्ति के चलते विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) पृष्ठभूमि से आने वाले अमेरिकी युवाओं और हालिया स्नातकों के लिए घरेलू बाजार में नौकरियां पाना बेहद कठिन हो गया था। भारतीय इंजीनियरों पर सबसे बड़ा प्रहार: 70% वीजा शेयर के कारण भारत सबसे अधिक प्रभावित यह फैसला अमेरिका में अपने तकनीकी करियर को आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखने वाले भारतीय सॉफ्टवेयर डेवलपर्स, डेटा साइंटिस्ट्स और सिस्टम एनालिस्ट्स के लिए बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि समूचे H-1B वीजा तंत्र में भारतीय नागरिकों की हिस्सेदारी सबसे व्यापक और निर्णायक रही है। अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा (USCIS) की वित्तीय वर्ष 2025 की आधिकारिक H-1B रिपोर्ट के अनुसार, स्वीकृत होने वाली कुल H-1B याचिकाओं में से लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारतीय अभ्यर्थियों के नाम रहा है। इस सूची में चीन काफी बड़े अंतर के साथ दूसरे स्थान पर है, जिसकी स्वीकृतियों में मात्र 12.1 प्रतिशत हिस्सेदारी दर्ज की गई थी। ऐसे में जब अमेरिकी सरकार प्रति कर्मचारी लागत में अप्रत्याशित उछाल लाती है, तो उसका सीधा और सबसे व्यापक आर्थिक प्रभाव भारतीय पेशेवरों और भारत-आधारित वैश्विक आईटी सेवा प्रदाताओं पर ही पड़ता है। $995 से सीधे $100,000: वीजा लागत में 10,000% का ऐतिहासिक इजाफा पुरानी मानक व्यवस्था पर नजर डालें तो अमेरिकी कंपनियों को एक H-1B आवेदक को स्पॉन्सर करने के लिए प्राथमिक तौर पर केवल 995 डॉलर का सरकारी भुगतान करना पड़ता था, जिसमें 215 डॉलर की प्रारंभिक लॉटरी एंट्री फीस और 780 डॉलर का मानक नियोक्ता याचिका शुल्क शामिल हुआ करता था। इसकी तुलना में 100,000 डॉलर की नई अनिवार्य आवश्यकता सीधे तौर पर 10,000 प्रतिशत से भी अधिक की अकल्पनीय वृद्धि दर्शाती है। इस भारी वित्तीय दायित्व ने वैश्विक स्तर पर प्रतिभाओं को हायर करने वाली टेक कंपनियों के बजट और भर्ती मॉडल को पूरी तरह झकझोर दिया है। कॉरपोरेट विश्लेषकों का स्पष्ट आकलन है कि अब अमेरिकी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां नई भर्तियों के लिए याचिकाओं की संख्या में भारी कटौती करेंगी, जिससे आने वाले महीनों में जारी होने वाले कुल H-1B वीजा की संख्या में भारी गिरावट दर्ज होना तय है। जूनियर डेवलपर्स के लिए रास्ते बंद: टेक दिग्गजों ने जारी किए थे इमर्जेंसी एडवाइजरी इस नियम के चलते विदेशी प्रतिभाओं के सामने एक बहुत बड़ी वित्तीय दीवार खड़ी हो गई है। उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, उच्च विशेषज्ञता वाले वरिष्ठ आर्किटेक्ट्स या दुर्लभ तकनीक में दक्ष दिग्गजों के लिए तो शीर्ष कंपनियां शायद इस विशाल राशि का भुगतान करने पर विचार कर लें, लेकिन शुरुआती करियर वाले जूनियर सॉफ्टवेयर डेवलपर्स और एंट्री-लेवल इंजीनियरों के लिए अमेरिकी ऑन-साइट प्रोजेक्ट्स पर जाने के रास्ते लगभग बंद हो रहे हैं। गौरतलब है कि पिछले साल जब इस नियम को पहली बार लागू करने की तैयारी की गई थी, तब अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और जेपी मॉर्गन चेस जैसी दिग्गज बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने विदेशी कार्यबल के लिए आनन-फानन में सख्त यात्रा परामर्श जारी किए थे। उस दौरान छुट्टी पर भारत या विदेश गए तकनीकी कर्मियों को निर्देश दिया गया था कि वे 20 सितंबर 2025 की मध्यरात्रि को नई मूल्य प्रणाली प्रभावी होने से पहले किसी भी तरह अमेरिका वापस लौट आएं, जिससे भारी अफरा-तफरी मच गई थी। अब इस नियम के सितंबर 2027 तक विस्तारित होने से अमेरिकी टेक कंपनियों को अपनी ऑन-साइट डिलीवरी रणनीति को छोड़कर ऑफ-शोरिंग और रिमोट डेवलपमेंट सेंटरों पर अधिक निर्भर होना पड़ेगा।
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