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बैलेट पेपर का लिटमस टेस्ट: 'वोट चोरी' का नैरेटिव और सांगठनिक विफलता का असली आईना

📰 Prabhasakshi 🕐 1 min read 📅 October 28, 2026 👁 1 views
बैलेट पेपर का लिटमस टेस्ट: 'वोट चोरी' का नैरेटिव और सांगठनिक विफलता का असली आईना
भारतीय लोकतांत्रिक विमर्श में पिछले कुछ वर्षों से एक अजीब और गहरी चिंताजनक परिपाटी देखने को मिल रही है। देश के राजनैतिक दल अपनी सांगठनिक कमजोरियों, जमीन से कटते जा रहे कार्यकर्ताओं और जनता के बीच नीतियों के गहरे संकट पर आत्ममंथन करने के बजाय, अपनी हर पराजय का पूरा ठीकरा देश की संवैधानिक चुनावी व्यवस्था पर फोड़ देते हैं। इस पूरे राजनैतिक खेल में 'इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन' यानी ईवीएम को एक बड़े वैश्विक खलनायक के रूप में पेश किया गया। कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष ने एक सुर में 'वोट चोरी' का एक ऐसा आक्रामक और संदेहास्पद नैरेटिव गढ़ा, जिसने आम मतदाताओं के मन में देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास के बीज बोने की पुरजोर कोशिश की। राष्ट्रीय स्तर पर महीनों तक इस बात का माहौल बनाया गया कि यदि देश को वापस मतपत्र यानी पुरानी बैलेट पेपर प्रणाली के दौर में ले जाया जाए, तो लोकतंत्र का खोया हुआ गौरव और निष्पक्षता रातों-रात बहाल हो जाएगी। लेकिन भारतीय लोकतंत्र की यही सबसे बड़ी खूबसूरती है कि वह अपने शांत मगर अचूक और ऐतिहासिक फैसलों से बड़े-बड़े राजनैतिक ढोंग, खोखले दावों और हवा-हवाई नैरेटिव की कलई खोलकर रख देता है। हाल ही में उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की 28 विधान परिषद सीटों पर पूरी तरह बैलेट पेपर से हुए चुनावों के परिणाम किसी भी गंभीर राजनैतिक विश्लेषक के लिए आंखें खोलने वाले हैं। जब चुनावी खेल पूरी तरह से कांग्रेस की मनपसंद मतपत्र प्रणाली से खेला गया—जहां न तो कोई माइक्रोचिप थी, न कोई सॉफ्टवेयर था, न कोई प्रोग्रामिंग थी और न ही तकनीक का कोई अदृश्य हस्तक्षेप था—तब भी कांग्रेस को मिला करारा सांगठनिक झटका यह अकाट्य रूप से साबित करता है कि समस्या मशीनों की तकनीक में नहीं, बल्कि पार्टी की बुनियादी राजनीति, नीयत और धरातल में है। 23 अक्टूबर को देश के चार बड़े और राजनैतिक रूप से बेहद संवेदनशील राज्यों की 28 विधान परिषद सीटों पर मतपत्रों के जरिए वोट डाले गए थे। 27-28 अक्टूबर को जब मतपेटियां खुलीं, तो चुनावी भूगोल की एक बिल्कुल नई और अप्रत्याशित तस्वीर सामने आई। यह चुनाव कोई आम जनता या आम जनसभाओं का पारंपरिक चुनाव नहीं था, बल्कि यह विधान परिषद के 'स्नातक' और 'शिक्षक' निर्वाचन क्षेत्रों का विशेष चुनाव था। इन चारों राज्यों का संपूर्ण चुनावी परिदृश्य कांग्रेस के दावों की जमीनी हकीकत को बयां करता है: पहले कर्नाटक की बात करें-यहाँ कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा, ऐतिहासिक और सबसे आत्मघाती झटका रहा है। कर्नाटक में कांग्रेस की पूर्ण बहुमत वाली सिद्धारमैया सरकार होने के बावजूद, बैलेट पेपर से हुए इस चुनाव में भाजपा-जेडीएस गठबंधन ने बाजी मार ली। बेंगलुरु टीचर्स निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा-जेडीएस के एपी रंगनाथ ने सिटिंग एमएलसी पुट्टन्ना को करारी शिकस्त दी, वहीं वेस्ट ग्रेजुएट्स सीट पर भाजपा के एस.वी. संकनूर ने लगातार तीसरी बार कांग्रेस के मोहन लिम्बिकाई को ९,३२३ मतों के बहुत बड़े अंतर से पराजित किया। जब सत्ताधारी दल अपने ही राज्य में मतपत्रों से हार जाए, तो दोष किसे दिया जाए? बिहार की शिक्षक और स्नातक सीटों पर कांग्रेस का प्रदर्शन एक बार फिर दयनीय और निराशाजनक रहा। दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में प्रशांत किशोर की नवगठित 'जन सुराज पार्टी' के उम्मीदवार सुरेश राय ने कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व बिहार प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा को करारी शिकस्त देकर राज्य के राजनैतिक गलियारों में हलचल मचा दी। यहां तक कि मतपत्रों के दौर में भी कांग्रेस अपने पुराने नेताओं की साख नहीं बचा पा रही है। उत्तर प्रदेश में वजूद का संकट उभर आया। यहाँ की 11 सीटों पर मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (SP) के बीच ही सिमट कर रह गया। मेरठ जैसी महत्वपूर्ण सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की और वाराणसी में सपा ने अपना दमखम दिखाया, जबकि कांग्रेस इस पूरे मतपत्र वाले चुनाव में कहीं भी रेस में दिखाई नहीं दी। महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी और विशेषकर कांग्रेस के लिए राहत की बात केवल यह रही कि नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस के मौजूदा एमएलसी अभिजीत वंजारी शुरुआती दौर से ही भाजपा के सुधाकर कोहले पर बढ़त बनाए रखने में सफल रहे। हालांकि, अगर चारों राज्यों के ओवरऑल प्रदर्शन को देखा जाए, तो कांग्रेस अपने सहयोगियों की तुलना में बेहद कमजोर और ढीली जमीन पर खड़ी दिखाई देती है। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व से लेकर स्थानीय प्रवक्ताओं तक ने देश में एक ऐसा आभासी माहौल बना दिया था कि "देश की जनता तो हमें छप्पर फाड़कर जिताना चाहती है, लेकिन सरकारी मशीनरी ईवीएम में गुप्त हेरफेर करके हमारे वैध वोट चुरा लेती है। " हालिया हरियाणा विधानसभा चुनाव हो या देश के अन्य बड़े चुनाव, कांग्रेस ने हमेशा इसी विक्टिम कार्ड का इस्तेमाल करके अपनी सांगठनिक कमजोरियों पर पर्दा डाला। लेकिन २८ विधान परिषद सीटों के इन बैलेट पेपर वाले परिणामों ने कांग्रेस को तार्किक रूप से एक ऐसे बंद कमरे में ला खड़ा किया है, जहां से निकलने का अब कोई वैचारिक रास्ता नहीं बचा है। अब यक्ष प्रश्न यह उठता है कि क्या कांग्रेस कर्नाटक और बिहार के इन करारे परिणामों के बाद भी 'वोट चोरी' का वही पुराना विलाप कर सकती है? जहां हर एक मतपत्र पर प्रत्येक वोटर ने अपने हाथ से पेन के जरिए अपनी प्राथमिकता दर्ज की थी, जहां मतपेटियों को सील करने से लेकर स्ट्रांग रूम की सुरक्षा और निगरानी तक कांग्रेस के अपने अधिकृत काउंटिंग एजेंट चौबीसों घंटे तैनात थे, वहां कांग्रेस की इस सांगठनिक दुर्गति का आखिर क्या बहाना होगा? विशेष रूप से कर्नाटक जैसे राज्य में, जहां गृह विभाग से लेकर पूरा प्रशासनिक और पुलिस अमला खुद कांग्रेस सरकार के अधीन कार्य कर रहा है, वहां बैलेट पेपर पर भाजपा-जेडीएस गठबंधन कैसे क्लीन स्विप कर गया? इस पराजय ने विरोधी दलों को एक अचूक और अकाट्य राजनैतिक ब्रह्मास्त्र थमा दिया है। अब भाजपा का यह तंज तार्किक रूप से बिल्कुल सही प्रतीत होता है कि कांग्रेस को देश की जागरूक जनता, चुनाव आयोग और ईवीएम तकनीक से सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। जब कोई राजनैतिक दल अपनी वास्तविक सांगठनिक बीमारियों का इलाज करने के बजाय एक काल्पनिक दुश्मन खड़ा कर लेता है, तो वह आत्ममुग्धता का शिकार हो जाता है, और यही कांग्रेस के पतन का सबसे बड़ा कारण बन रहा है। इन चुनावों की अंतर्निहित प्रकृति को समझना भी बेहद आवश्यक है। यह कोई सामान्य, भावुक, मुफ़्त की घोषणाओं या पारंपरिक जातिगत समीकरणों पर लड़ा जाने वाला आम चुनाव नहीं था। स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में मतदान का विधिक अधिकार केवल उसी नागरिक को होता है जिसके पास किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय की न्यूनतम स्नातक (Graduation) की डिग्री हो। इसी प्रकार, शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में केवल वे ही वोटर होते हैं जो माध्यमिक या उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्यापन कार्य से जुड़े हैं। यानी सीधे शब्दों में कहें तो यह हमारे समाज का सबसे 'प्रबुद्ध', 'शिक्षित', 'जागरूक' और 'बौद्धिक' वर्ग है, जो अखबारों की सुर्खियों से लेकर सोशल मीडिया के प्रोपेगैंडा और सरकारों की नीतियों का बहुत बारीक और तार्किक विश्लेषण करता है। इस प्रबुद्ध वर्ग द्वारा बैलेट पेपर के सामने खड़े होकर भी कांग्रेस की राजनीति को बड़े पैमाने पर खारिज किए जाने के पीछे तीन स्पष्ट और कड़े संदेश छिपे हैं: पहला --देश का शिक्षित युवा और प्रबुद्ध समाज अब केवल इस बात पर आंख मूंदकर वोट नहीं देता कि "संविधान खतरे में है" या "देश की सभी लोकतांत्रिक संस्थाएं बेची जा रही हैं। " वे एक रचनात्मक और व्यावहारिक विकल्प देखना चाहते हैं। कांग्रेस का पूरा ध्यान चौबीसों घंटे केवल केंद्र सरकार पर कीचड़ उछालने और व्यवस्था को कोसने में केंद्रित रहा, लेकिन जब बात युवाओं को रोजगार देने, शिक्षा व्यवस्था के बुनियादी ढांचे में सुधार करने और आर्थिक नीतियों का एक बेहतर स्थानीय मॉडल पेश करने की आई, तो कांग्रेस के पास कोई ठोस वैचारिक खाका नहीं था। शिक्षित वर्ग ने इस राजनैतिक नकारात्मकता को सिरे से खारिज कर दिया। विधान परिषद के इन विशिष्ट चुनावों में मतदाता सूची आम चुनावों की तरह स्वतः नहीं बनती। इस चुनाव से कई महीने पहले राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर, डिग्री कॉलेजों, दफ्तरों और सोसायटियों में जाकर स्नातकों के फॉर्म भरवाने होते हैं और बड़ी मशक्कत के साथ उन्हें वोटर लिस्ट में पंजीकृत करवाना होता है। जिस पार्टी का कैडर और जमीनी नेटवर्क जितना सक्रिय होगा, उसके वोटर उतने ही अधिक बनेंगे। भाजपा और उसके वैचारिक संगठनों का पन्ना-प्रमुख स्तर का ढांचा इस काम में महीनों पहले से जुट जाता है। इसके विपरीत, कांग्रेस का पूरा ढांचा केवल सोशल मीडिया की वॉर-रूम, प्रेस कॉन्फ्रेंस और बड़े नेताओं की रैलियों तक ही सीमित रह गया है। कांग्रेस का कार्यकर्ता जमीन पर जाकर युवाओं का पंजीकरण कराने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ, जिसका खामियाजा नतीजों में भुगतना पड़ा। साथ ही शिक्षित मतदाता हमेशा उम्मीदवार की व्यक्तिगत साख, उसकी समाज में पहुंच और उसकी बौद्धिक क्षमता को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। कांग्रेस के भीतर की अंदरूनी गुटबाजी और स्थानीय जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का खामियाजा पार्टी को इन राज्यों में भुगतना पड़ा है। कर्नाटक हो या महाराष्ट्र, टिकटों के बंटवारे में अक्सर दिल्ली दरबार या बड़े क्षत्रपों की निजी पसंद-नापसंद हावी रहती है, जिससे जमीन पर सालों से पसीना बहाने वाला स्थानीय नेता उपेक्षित रह जाता है। प्रबुद्ध मतदाताओं ने ऐसे पैराशूट या कमजोर उम्मीदवारों को तवज्जो देने से साफ इनकार कर दिया। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
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