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चुनाव आते ही भाषा की मर्यादा का पतन क्यों?
डॉ. मनमोहन प्रकाश, स्वतंत्र पत्रकार लोकतंत्र में चुनाव विचारों, नीतियों और नेतृत्व की परीक्षा का अवसर होते हैं। राजनीतिक दलों से अपेक्षा की जाती है कि वे जनता के सामने विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और कानून-व्यवस्था जैसे बुनियादी मुद्दों पर अपना दृष्टिकोण रखेंगे। लेकिन चुनाव नजदीक आते ही जनहित के प्रश्न पीछे छूटने लगते हैं और उनकी जगह व्यक्तिगत कटाक्ष, अपमानजनक टिप्पणियाँ तथा अमर्यादित भाषा लेने लगती है। सवाल यह है कि क्या राजनीतिक विरोध के लिए अब भाषा की कोई मर्यादा शेष नहीं रह गई है? पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के वक्तव्यों ने ...
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