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एसिड अटैक पीड़ितों को रेलवे किराए में मिलेगी राहत, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में दी बड़ी जानकारी
नई दिल्ली. एसिड अटैक पीड़ितों के लिए रेलवे यात्रा को आसान बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष महत्वपूर्ण जानकारी दी है. केंद्र ने गुरुवार को अदालत को बताया कि रेलवे बोर्ड ने इलाज के लिए यात्रा करने वाले एसिड अटैक पीड़ितों को रेलवे किराए में रियायत देने की नीति बनाने पर सैद्धांतिक रूप से सहमति जताई है. सरकार अब इस संबंध में नीति का प्रारूप तैयार कर उसे सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड पर रखेगी. अदालत ने केंद्र को नीति का ड्राफ्ट प्रस्तुत करने के लिए छह सप्ताह का समय दिया है. यह मामला एसिड अटैक पीड़ितों को इलाज और चिकित्सा जांच के लिए रेल यात्रा में मिलने वाली सुविधाओं से जुड़ा है. सुप्रीम कोर्ट पहले ही केंद्र सरकार से इस विषय पर विचार करने को कह चुका था. अदालत ने सुझाव दिया था कि एसिड अटैक पीड़ितों को उन दिव्यांग व्यक्तियों की श्रेणी में शामिल करने पर विचार किया जाए, जिन्हें इलाज और समय-समय पर चिकित्सकीय जांच के लिए रेलवे में किराए में रियायत और जरूरत पड़ने पर आपातकालीन कोटा जैसी सुविधाएं मिलती हैं. गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे ने रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष के साथ हुई चर्चा की जानकारी अदालत को दी. उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष के साथ विस्तार से बातचीत हुई है और बोर्ड इस बात पर सहमत है कि एसिड अटैक पीड़ितों को इलाज के लिए यात्रा करने वाले ‘मरीज’ की श्रेणी में रेलवे किराए में रियायत दी जानी चाहिए. केंद्र की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि एसिड अटैक पीड़ित दिव्यांगता की श्रेणी में आ सकते हैं, लेकिन प्रस्तावित रेलवे रियायत उन्हें सीधे दिव्यांग श्रेणी के आधार पर देने के बजाय ‘मरीज’ श्रेणी के तहत दी जाएगी. सरकार का तर्क है कि एसिड अटैक पीड़ितों को नियमित रूप से इलाज, चिकित्सकीय परामर्श, जांच और कई मामलों में सर्जरी के लिए यात्रा करनी पड़ सकती है. इसलिए उनकी विशेष चिकित्सा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए मरीज की श्रेणी में रियायत देने का प्रावधान अधिक उपयुक्त होगा. सरकार ने दिव्यांग श्रेणी के तहत अलग से रियायत देने को लेकर अपनी कुछ व्यावहारिक चिंताएं भी अदालत के सामने रखीं. अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि रेलवे की मौजूदा व्यवस्था में सभी दिव्यांग व्यक्तियों को किराए में रियायत उपलब्ध नहीं है. यदि एसिड अटैक पीड़ितों को केवल दिव्यांगता के आधार पर नई रियायत दी जाती है तो दिव्यांग व्यक्तियों की अन्य श्रेणियों की ओर से भी ऐसी ही मांगें उठ सकती हैं. इससे विभिन्न श्रेणियों के बीच अलग-अलग आधार पर रियायत निर्धारित करना जटिल हो सकता है. इसी कारण सरकार ने मरीज श्रेणी के तहत विशेष रियायत देने का रास्ता अपनाने की बात कही है. हालांकि याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद वेंकटरमणी ने प्रस्तावित व्यवस्था के सामने आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों की ओर अदालत का ध्यान आकर्षित किया. उन्होंने बताया कि मरीज श्रेणी के तहत रेलवे किराए में मौजूदा रियायत की व्यवस्था कई मामलों में दो स्टेशनों के बीच यात्रा तक सीमित होती है. एसिड अटैक पीड़ितों के मामले में यह व्यवस्था पर्याप्त नहीं हो सकती, क्योंकि उन्हें इलाज के लिए एक से अधिक शहरों और अस्पतालों की यात्रा करनी पड़ सकती है. अधिवक्ता ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई पीड़ित हिमाचल प्रदेश से चेन्नई इलाज के लिए जाता है तो उसे वहां के अस्पताल या डॉक्टर से रियायत संबंधी प्रमाण-पत्र लेना पड़ सकता है. यदि मरीज को उपचार के दौरान अलग-अलग अस्पतालों या चिकित्सकों के पास जाना पड़े तो हर स्थान पर अलग प्रमाण-पत्र की आवश्यकता उसके लिए अतिरिक्त परेशानी पैदा कर सकती है. एसिड अटैक पीड़ितों को कई बार लंबे समय तक इलाज और लगातार चिकित्सकीय निगरानी की जरूरत होती है. ऐसे में रेलवे रियायत की प्रक्रिया भी सरल और व्यावहारिक होनी चाहिए. याचिकाकर्ता की ओर से यह भी बताया गया कि एसिड अटैक के मामलों में पीड़ितों को कई सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है. चेहरे, आंखों, त्वचा और शरीर के अन्य हिस्सों पर हुए गंभीर प्रभावों के कारण उपचार एक ही अस्पताल या शहर तक सीमित नहीं रहता. विशेषज्ञ चिकित्सकों से परामर्श, सर्जरी और फॉलोअप के लिए अलग-अलग स्थानों की यात्रा करनी पड़ सकती है. ऐसी स्थिति में यदि हर यात्रा के लिए अलग औपचारिकता पूरी करनी पड़े तो रियायत का उद्देश्य ही कमजोर हो सकता है. सुनवाई के दौरान पीड़ितों की कानूनी जरूरतों का मुद्दा भी सामने आया. एसिड अटैक के मामले केवल चिकित्सा उपचार तक सीमित नहीं होते. पीड़ितों को अपने मामले से संबंधित कानूनी कार्यवाही, सुनवाई और अन्य प्रक्रियाओं के लिए भी एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करनी पड़ सकती है. इसलिए रेलवे रियायत की नीति तैयार करते समय केवल अस्पताल जाने की यात्रा को ही आधार न बनाकर पीड़ितों की व्यापक परिस्थितियों पर विचार करने की जरूरत बताई गई. याचिकाकर्ता की ओर से एसिड अटैक पीड़ितों के लिए रेलवे के आपातकालीन कोटे की सुविधा देने की मांग भी रखी गई. तर्क दिया गया कि हमले के शुरुआती तीन महीनों में पीड़ितों को गंभीर और तत्काल चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता हो सकती है. इस दौरान अचानक यात्रा करनी पड़े तो सामान्य टिकट व्यवस्था के कारण उन्हें कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे मामलों में आपातकालीन कोटे की सुविधा पीड़ितों को समय पर उपचार तक पहुंचने में मदद कर सकती है. केंद्र सरकार की ओर से इस सुझाव को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया. अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि नीति तैयार करते समय इन पहलुओं पर विचार किया जा सकता है. उन्होंने संकेत दिया कि रियायत किस प्रकार दी जाएगी, उसकी अवधि क्या होगी और किन परिस्थितियों में इसका लाभ मिलेगा, इन सभी पहलुओं को नीति में स्पष्ट किया जाना आवश्यक है. सरकार ने अदालत से नीति के विस्तृत स्वरूप को अंतिम रूप देने के लिए समय मांगा. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को प्रस्तावित नीति का ड्राफ्ट रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया. पीठ ने केंद्र को छह सप्ताह का समय देते हुए कहा कि सरकार नीति तैयार कर अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे. मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि नीति सामने आने के बाद अदालत देखेगी कि पीड़ितों को कितनी रियायत मिलती है और क्या प्रावधान किए जाते हैं. इस मामले में अदालत का रुख एसिड अटैक पीड़ितों की चिकित्सा और पुनर्वास संबंधी जरूरतों को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है. एसिड अटैक का प्रभाव केवल शारीरिक चोट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पीड़ितों को लंबे समय तक चिकित्सा, सर्जरी, पुनर्वास और सामाजिक तथा कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में इलाज तक पहुंच को आसान बनाने वाली परिवहन सुविधा उनकी पुनर्वास प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है. केंद्र द्वारा रेलवे बोर्ड की सैद्धांतिक सहमति की जानकारी दिए जाने के बाद अब अगला महत्वपूर्ण कदम नीति के अंतिम स्वरूप का होगा. छह सप्ताह के भीतर पेश होने वाले ड्राफ्ट में यह स्पष्ट होना है कि रियायत किन यात्राओं पर लागू होगी, उसका लाभ लेने की प्रक्रिया क्या होगी, प्रमाण-पत्र की आवश्यकता कैसे पूरी की जाएगी और लंबे उपचार के दौरान बार-बार यात्रा करने वाले पीड़ितों को किस तरह सुविधा दी जाएगी. मामला Atijeevan Society बनाम Union of India एवं अन्य के रूप में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है. अदालत के अगले चरण की कार्यवाही में केंद्र द्वारा तैयार की जाने वाली नीति का प्रारूप महत्वपूर्ण रहेगा. यदि प्रस्तावित व्यवस्था में इलाज के लिए यात्रा करने वाले एसिड अटैक पीड़ितों की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाता है तो इससे देशभर में उपचार के लिए लंबी दूरी तय करने वाले पीड़ितों को रेलवे यात्रा में आर्थिक राहत के साथ-साथ यात्रा प्रक्रिया में भी सुविधा मिलने की उम्मीद है.
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