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हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा, कोर्ट फीस से 500 रुपये मिलते हैं तो न्याय पर खर्च सिर्फ 87 रुपये क्यों ?
जबलपुर. मध्य प्रदेश में न्यायपालिका के लिए बजट आवंटन और न्यायिक अधोसंरचना की स्थिति को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की वित्तीय प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल उठाए हैं. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि एक मुकदमे से सरकार को कोर्ट फीस के रूप में करीब 500 रुपये की आय होती है, जबकि उसी मुकदमे पर न्यायिक व्यवस्था के लिए सरकार का खर्च महज 87 रुपये बताया गया है. कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब न्यायपालिका के माध्यम से सरकार को राजस्व प्राप्त हो रहा है तो न्याय व्यवस्था को मजबूत करने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने में इतनी कंजूसी क्यों बरती जा रही है. सुनवाई के दौरान वित्त सचिव मनीष रस्तोगी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुए. न्यायपालिका के लिए बजट और संसाधनों से जुड़े मुद्दे पर हुई बातचीत में जब न्यायपालिका के लिए विभाग शब्द का इस्तेमाल किया गया तो हाई कोर्ट ने इस पर आपत्ति जताई. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका को किसी सरकारी विभाग के रूप में नहीं देखा जा सकता. न्यायपालिका संविधान का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और उसकी स्वतंत्र एवं प्रभावी कार्यप्रणाली लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी आवश्यकता है. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक व्यवस्था पर होने वाले खर्च को सामान्य सरकारी विभागों के खर्च की तरह नहीं देखा जाना चाहिए. अदालतों के भवन, न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति, कर्मचारियों की उपलब्धता, तकनीकी सुविधाएं और अन्य बुनियादी ढांचा सीधे तौर पर न्याय प्रदान करने की क्षमता से जुड़े हैं. यदि अदालतों के पास पर्याप्त भवन और संसाधन नहीं होंगे तो न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति के बावजूद मामलों की सुनवाई और निपटारे की गति प्रभावित होगी. हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से अन्य विभागों की तुलना में न्यायपालिका को अब तक आवंटित किए गए बजट का पूरा विवरण भी मांगा है. कोर्ट यह जानना चाहता है कि राज्य के कुल बजट में न्यायपालिका के लिए कितना प्रावधान किया जाता है और अन्य विभागों की तुलना में न्यायिक व्यवस्था को किस स्तर पर प्राथमिकता दी जा रही है. सुनवाई के दौरान कोर्ट का जोर इस बात पर रहा कि न्यायपालिका को केवल सरकारी खर्च के नजरिये से देखना उचित नहीं है. न्यायिक व्यवस्था में किया गया निवेश सीधे तौर पर नागरिकों को समयबद्ध और प्रभावी न्याय उपलब्ध कराने से जुड़ा है. न्यायिक अधोसंरचना की स्थिति को लेकर कोर्ट ने प्रदेश के कई जिलों का भी उल्लेख किया. इंदौर और भोपाल को छोड़कर अन्य जिलों में कई स्थानों पर न्यायालयों के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने की स्थिति सामने आई. कई जगह न्यायाधीशों के लगभग आधे पद खाली हैं. कोर्ट ने इस स्थिति पर महत्वपूर्ण सवाल उठाते हुए कहा कि यदि खाली पदों को भर भी दिया जाए तो नए न्यायाधीश बैठेंगे कहां और न्यायिक कार्य करेंगे कैसे. पर्याप्त भवन, कोर्ट रूम और आवश्यक सुविधाएं नहीं होने पर नियुक्ति के बावजूद न्यायिक कामकाज सुचारु रूप से संचालित करना मुश्किल होगा. न्यायालय ने कहा कि अपर्याप्त न्यायिक अधोसंरचना का सीधा प्रभाव लंबित मामलों की संख्या पर पड़ता है. यदि किसी जिले में न्यायाधीशों के पद रिक्त हैं और अदालत के पास पर्याप्त भवन या कोर्ट रूम नहीं हैं तो इसका असर मामलों की सुनवाई पर पड़ना स्वाभाविक है. इससे मुकदमों के निपटारे में देरी होती है और लंबित मामलों का बोझ बढ़ता जाता है. इसलिए न्यायिक पदों को भरने के साथ-साथ भवन और अन्य सुविधाओं का विकास भी समान प्राथमिकता से किया जाना चाहिए. कोर्ट ने न्यायपालिका के बजट में हाल के वर्षों में हुई वृद्धि को भी पर्याप्त नहीं माना. युगल पीठ ने कहा कि न्यायपालिका के लिए बजट तैयार करते समय केवल वर्तमान आवश्यकताओं को देखकर योजना नहीं बनाई जानी चाहिए. सरकार को अगले 15 से 20 वर्षों की जरूरतों का आकलन करते हुए दीर्घकालीन योजना तैयार करनी चाहिए. अदालतों की बढ़ती संख्या, लंबित मामलों, न्यायिक अधिकारियों की आवश्यकता, कर्मचारियों की नियुक्ति, नए कोर्ट भवन, आवास, तकनीकी संसाधन और डिजिटल न्याय व्यवस्था को ध्यान में रखकर भविष्य की आवश्यकताओं का अनुमान लगाया जाना चाहिए. हाई कोर्ट ने इस संबंध में कोर्ट मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता केसी घिल्डियाल और अधिवक्ता अंशुमान सिंह से भी सुझाव देने को कहा है. न्यायालय का मानना है कि न्यायिक व्यवस्था के लिए दीर्घकालीन वित्तीय योजना तैयार करने में व्यावहारिक सुझाव महत्वपूर्ण हो सकते हैं. यदि आज की जरूरत के आधार पर ही बजट तैयार किया जाता रहा तो आने वाले वर्षों में न्यायालयों पर बढ़ते मामलों और बढ़ती आबादी के अनुरूप आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराना मुश्किल हो सकता है. मामले की शुरुआत अनूपपुर में कोर्ट के किराये के भवन में संचालित होने की समस्या से हुई. अधिवक्ता बासुदेव चटर्जी की जनहित याचिका में बताया गया कि अनूपपुर में नई कोर्ट बिल्डिंग के निर्माण का मामला 3 फरवरी 2021 से लंबित है. लंबे समय तक नई इमारत का निर्माण नहीं होने के कारण न्यायालय को किराये के भवन में संचालित करना पड़ रहा है. इस समस्या को लेकर वर्ष 2025 में जनहित याचिका दायर की गई थी. मामले की सुनवाई आगे बढ़ने के साथ यह मुद्दा केवल अनूपपुर की एक अदालत के भवन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रदेश की व्यापक न्यायिक अधोसंरचना और बजट व्यवस्था पर चर्चा का आधार बन गया. 28 जुलाई को हुई सुनवाई में हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए वित्त सचिव और विधि सचिव को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के निर्देश दिए थे. इसके बाद बुधवार की सुनवाई में वित्त सचिव मनीष रस्तोगी वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित हुए. सुनवाई के दौरान न्यायपालिका के लिए बजट आवंटन और अधोसंरचना की स्थिति को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल सामने आए. कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि न्यायपालिका के बजट और अधोसंरचना को लेकर विस्तृत आदेश जारी किया जा सकता है. यदि ऐसा आदेश जारी होता है तो इसका प्रभाव केवल अनूपपुर की कोर्ट बिल्डिंग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रदेश के उन सभी जिलों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है जहां न्यायालयों के पास पर्याप्त भवन, कोर्ट रूम, न्यायिक अधिकारियों या अन्य आवश्यक सुविधाओं की कमी है. सुनवाई के दौरान कोर्ट की टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू न्यायपालिका को सरकारी खर्च का सामान्य मद मानने के बजाय संवैधानिक संस्था के रूप में देखने का रहा. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका संविधान का एक पिलर है. इसलिए इसके लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराना केवल बजट का प्रश्न नहीं, बल्कि नागरिकों को न्याय उपलब्ध कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी से जुड़ा विषय है. कोर्ट फीस से सरकार को होने वाली आय और न्यायिक व्यवस्था पर होने वाले खर्च के बीच के अंतर का उल्लेख करते हुए हाई कोर्ट ने जिस तरह सवाल उठाया है, उससे न्यायपालिका के लिए वित्तीय प्राथमिकताओं पर व्यापक बहस की संभावना बन गई है. एक ओर अदालतों में लंबित मामलों का दबाव लगातार बढ़ रहा है, दूसरी ओर कई जिलों में न्यायिक अधोसंरचना और न्यायाधीशों के पदों की कमी बनी हुई है. ऐसे में केवल पदों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनके लिए कोर्ट रूम, कार्यालय, कर्मचारियों और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था भी करनी होगी. फिलहाल हाई कोर्ट ने मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. अदालत की टिप्पणियों और निर्देशों से संकेत मिल रहा है कि आने वाले आदेश में न्यायपालिका के बजट, न्यायिक भवनों और दीर्घकालीन अधोसंरचना योजना को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश सामने आ सकते हैं. यदि सरकार अगले 15 से 20 वर्षों की जरूरतों को ध्यान में रखकर न्यायपालिका के लिए वित्तीय और अधोसंरचनात्मक योजना तैयार करती है तो इसका सीधा लाभ अदालतों के कामकाज और न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हजारों पक्षकारों को मिल सकता है.
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