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इग्नू अपने थिएटर कोर्स के प्रैक्टिकल दिल्ली में करवा रहा, वर्किंग स्टूडेंट्स के लिए 15-20 दिन की लीव लेना चुनौती
डिस्टेंस लर्निंग कांसेप्ट शुरू इसलिए हुआ था ताकि स्टूडेंट्स को अपने ही शहर में पढ़ाई का मौका मिल सके लेकिन इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी (इग्नू) के थिएटर आर्ट्स के कोर्सेज में प्रेक्टिकल की व्यवस्था इस उद्देश्य पर सवाल खड़े कर रही है। कोर्स में एडमिशन लेने वाले देशभर के स्टूडेंट्स को प्रेक्टिकल क्लासेज के लिए दिल्ली जाना पड़ता है। इसके लिए वहां 15-20 दिन तक रुकना पड़ता है। यह उन स्टूडेंट्स के लिए परेशानी बन रहा है जो काम करने के साथ-साथ यह कोर्स कर रहे हैं। उन्हें वहां इतने दिन ठहरने के लिए छुट्टी नहीं मिल पाती। साथ ही आना-जाना और वहां ठहरना भी काफी खर्चीला हो जाता है। इस वजह से रंगमंच की पढ़ाई में रुचि रखने वाले कई अभ्यर्थी केवल दिल्ली जाने की बाध्यता के कारण एडमिशन लेने से पीछे हट रहे हैं। बताया जा रहा है कि कोर्सेज में करीब 4 साल पहले तक स्थानीय स्तर पर प्रेक्टिकल करवाए जा रहे थे, मगर अब अदूरदर्शी व मनमाना निर्णय लेकर दिल्ली में प्रेक्टिकल करवा रहे हैं। जबकि इग्नू ने जोधपुर सहित देश के प्रमुख शहरों में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) से स्नातक और नाट्य कला में स्नातकोत्तर योग्यता रखने वाले विशेषज्ञों को काउंसलर के रूप में मान्यता दे रखी है। ये विशेषज्ञ स्थानीय स्तर पर थ्योरी और प्रैक्टिकल कक्षाएं लेने के साथ मूल्यांकन भी कर सकते हैं। नौकरी और पढ़ाई के बीच चुनना पड़ रहा एक विकल्प इग्नू के रंगमंच (ड्रामा/रंगमंच) से जुड़े छह माह, एक वर्ष और दो वर्ष के कोर्स में कई अभ्यर्थी ऐसे हैं, जो स्कूलों और संस्थानों में ड्रामा टीचर या कलाकार के रूप में काम कर रहे हैं। उनके लिए लगातार 15 से 20 दिन या प्रेक्टिकल सेशन की अवधि के अनुसार इससे अधिक समय तक कार्यस्थल से दूर रहना आसान नहीं है। इस परेशानी को देखते हुए जोधपुर के वरिष्ठ रंगकर्मी अरु व्यास और स्वाति व्यास ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री से ड्रामा/रंगमंच से जुड़े प्रमाणपत्र, डिप्लोमा व डिग्री कोर्सेज की प्रैक्टिकल कक्षाएं और परीक्षाएं स्टूडेंट के अपने शहर या निकटतम अध्ययन केंद्र पर करवाने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा, किसी शहर में 4-6 स्टूडेंट्स होने पर भी स्थानीय स्तर पर कक्षाएं लगें ताकि देशभर के रंगमंच कलाकारों और टीचर्स को दूरस्थ शिक्षा का वास्तविक लाभ मिल सके। स्टूडेंट्स बोले - स्थानीय स्तर पर मिले प्रेक्टिकल की सुविधा वरिष्ठ रंगकर्मी नीतू परिहार ने कहा कि थिएटर में रुचि रखने वाले छोटे शहरों के स्टूडेंट्स के लिए दिल्ली जाकर कई दिन रुकना फाइनेंशियली और प्रेक्टिकल रूप से मुश्किल है। महिलाओं को ज्यादा परेशानी उठानी पड़ती है इसलिए स्थानीय स्तर पर प्रैक्टिकल की सुविधा मिलनी चाहिए। इसी तरह ड्रामा से जुड़े महेश चौधरी ने कहा कि नौकरी करने वाले स्टूडेंट्स के लिए 15-20 दिन की लीव लेना आसान नहीं है। इससे पढ़ाई के साथ जॉब पर भी इफेक्ट पड़ता है। इसी तरह हरिप्रसाद वैष्णव ने कहा कि जब अलग-अलग शहरों में योग्य थिएटर विशेषज्ञ और काउंसलर उपलब्ध हैं तो स्टूडेंट्स को प्रैक्टिकल के लिए दिल्ली बुलाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
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