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जीसीसी क्षेत्र से भारतीय प्रवासियों के वेतन की चोरी का बड़ा खुलासा, सीयूएसबी अध्ययन में चौंकाने वाले तथ्य

📰 Palpal India 🕐 1 min read 📅 August 13, 2026 👁 2 views
जीसीसी क्षेत्र से भारतीय प्रवासियों के वेतन की चोरी का बड़ा खुलासा, सीयूएसबी अध्ययन में चौंकाने वाले तथ्य
अनिल मिश्र/पटना. खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) क्षेत्र से भारत लौटने वाले प्रवासी श्रमिकों को विदेश में नौकरी के दौरान वेतन की चोरी और बकाया राशि की वसूली के लिए लंबे संघर्ष का सामना करना पड़ता है. दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी), पंचानपुर, गया के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन में अंतरराष्ट्रीय श्रम प्रवास के इस महत्वपूर्ण लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चा वाले पहलू को सामने लाया गया है. अध्ययन में बताया गया है कि कई भारतीय प्रवासी श्रमिकों को रोजगार के दौरान उनके अधिकारों के अनुरूप पूरा वेतन और अन्य लाभ नहीं मिल पाते तथा भारत लौटने के बाद बकाया राशि हासिल करना उनके लिए बड़ी चुनौती बन जाता है. सीयूएसबी के इकोनॉमिक स्टडीज एंड पॉलिसी की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. फिरदौस फातिमा रिजवी और उनके शोधार्थी विक्रम, जो डेवलपमेंट स्टडीज से जुड़े हैं, ने यह अध्ययन किया है. ‘जीसीसी क्षेत्र से लौटे भारतीय प्रवासियों में वेतन की चोरी और बकाया राशि की वसूली’ (Wage Theft and Post-return Due Recovery among Indian Migrants from GCC Region) शीर्षक से किया गया यह शोध लेख ‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ (EPW) के हालिया अंक में विशेष लेख के रूप में प्रकाशित हुआ है. EPW को भारत में अर्थव्यवस्था, समाज, विकास और सार्वजनिक नीति से जुड़े विषयों पर गंभीर अकादमिक विमर्श के लिए प्रतिष्ठित पत्रिका माना जाता है. अध्ययन के सामने आने के बाद दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह ने डॉ. रिजवी और उनके शोधार्थी विक्रम को बधाई दी. उन्होंने महत्वपूर्ण और आवश्यक विषय पर अध्ययन करने के लिए शोधकर्ताओं के प्रयास की सराहना की. शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के माध्यम से प्रवासी श्रमिकों के सामने विदेश में रोजगार के दौरान आने वाली समस्याओं के साथ-साथ भारत लौटने के बाद भी जारी रहने वाले आर्थिक संकट को समझने का प्रयास किया है. डॉ. रिजवी के अनुसार बिहार लंबे समय से भारत के प्रमुख श्रम-प्रेषक राज्यों में शामिल रहा है. राज्य में रोजगार के सीमित अवसर, औद्योगीकरण और शहरीकरण का अपेक्षाकृत कम स्तर तथा विकास से जुड़ी लगातार चुनौतियां यहां से बड़े पैमाने पर श्रमिकों के दूसरे राज्यों और विदेशों की ओर पलायन का प्रमुख कारण रही हैं. खाड़ी सहयोग परिषद के देशों में भी बिहार से बड़ी संख्या में श्रमिक रोजगार के लिए जाते हैं. इन प्रवासियों के लिए विदेश में काम करना परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने और आय का स्थायी स्रोत बनाने का माध्यम होता है, लेकिन रोजगार के दौरान होने वाला शोषण उनकी आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है. यह अध्ययन बिहार के सिवान जिले के 385 लौटे हुए प्रवासी श्रमिकों से प्राप्त जमीनी साक्ष्यों पर आधारित है. सिवान को खाड़ी देशों में अंतरराष्ट्रीय श्रम प्रवास के लिए बिहार के प्रमुख केंद्रों में माना जाता है. अध्ययन में पाया गया कि कई प्रवासियों के लिए विदेश में काम करने के दौरान हुए श्रम शोषण के प्रभाव भारत लौटने के बाद भी समाप्त नहीं होते. उनके सामने बकाया वेतन और अन्य देय राशि की वसूली की समस्या बनी रहती है. शोधकर्ताओं के अनुसार अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष GCC देशों में रोजगार के दौरान वेतन चोरी की व्यापकता से जुड़ा है. नियोक्ताओं द्वारा अनुचित व्यवहार के विभिन्न मामलों का भी अध्ययन में उल्लेख किया गया है. वेतन चोरी से आशय ऐसी स्थिति से है जिसमें किसी कर्मचारी को कानून या रोजगार समझौते के तहत मिलने वाले वेतन अथवा लाभों से अनुचित या गैरकानूनी तरीके से वंचित किया जाता है. इसमें समय पर वेतन नहीं देना, वेतन रोक लेना, अनुचित या गैरकानूनी कटौती करना और रोजगार से जुड़े निर्धारित लाभ नहीं देना जैसी स्थितियां शामिल हो सकती हैं. अध्ययन में यह भी रेखांकित किया गया है कि प्रवासी श्रमिकों के सामने समस्या केवल विदेश में वेतन नहीं मिलने तक सीमित नहीं रहती. जब कोई श्रमिक भारत लौट आता है तो संबंधित नियोक्ता और गंतव्य देश की संस्थाओं से उसका सीधा संपर्क कमजोर या समाप्त हो जाता है. ऐसी स्थिति में बकाया वेतन की वसूली करना और अपने अधिकारों के लिए प्रभावी शिकायत दर्ज कराना कठिन हो जाता है. यही वजह है कि रोजगार के दौरान हुई आर्थिक क्षति का असर प्रवासी श्रमिक के परिवार पर लंबे समय तक बना रह सकता है. शोधकर्ताओं ने माना है कि शिक्षा और जागरूकता प्रवासी श्रमिकों को उनके अधिकारों के बारे में जानकारी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, लेकिन केवल जागरूकता बढ़ाने से समस्या का पूरी तरह समाधान संभव नहीं है. जब वेतन, रोजगार की शर्तों और काम से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों पर नियोक्ता का अधिक नियंत्रण हो तथा श्रमिक की विदेश में संस्थागत पहुंच सीमित हो, तब केवल व्यक्तिगत स्तर पर जागरूकता पर्याप्त नहीं रहती. ऐसे मामलों में संस्थागत व्यवस्था को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है. अध्ययन में गंतव्य देशों में नियोक्ताओं और वेतन भुगतान की बेहतर निगरानी पर जोर दिया गया है. शोधकर्ताओं ने अनिवार्य इलेक्ट्रॉनिक वेतन भुगतान प्रणाली लागू करने का सुझाव दिया है, ताकि श्रमिकों को मिलने वाले वेतन का रिकॉर्ड पारदर्शी तरीके से उपलब्ध रहे और भुगतान में अनियमितता की स्थिति में उसका सत्यापन किया जा सके. इसके साथ ही नियोक्ताओं की जवाबदेही तय करने वाला प्रभावी ढांचा विकसित करने की आवश्यकता बताई गई है. शोधकर्ताओं ने वेतन चोरी की घटनाओं को रोकने के लिए सख्त निगरानी और प्रभावी संस्थागत व्यवस्था की जरूरत भी बताई है. उनका मानना है कि श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा केवल संबंधित देश की सरकारों या नियोक्ताओं की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसमें भारत सहित श्रम-प्रेषक देशों और गंतव्य देशों के बीच समन्वय भी जरूरी है. सीमा-पार सहयोग के माध्यम से शिकायतों और बकाया वेतन की वसूली के मामलों को अधिक प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है. सीयूएसबी के इस अध्ययन ने ऐसे समय में प्रवासी श्रमिकों की आर्थिक सुरक्षा का मुद्दा सामने रखा है, जब बिहार सहित देश के कई राज्यों से बड़ी संख्या में श्रमिक रोजगार की तलाश में GCC देशों का रुख करते हैं. विदेश जाकर कमाई करने वाले श्रमिकों की आय उनके परिवारों के लिए महत्वपूर्ण होती है. ऐसे में वेतन में कटौती, भुगतान रोकना या बकाया राशि की वसूली में परेशानी का सीधा असर उनके परिवार की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है. अध्ययन ने इस समस्या को केवल व्यक्तिगत श्रमिक की परेशानी न मानकर श्रम प्रवासन और सार्वजनिक नीति से जुड़े व्यापक मुद्दे के रूप में देखने की जरूरत बताई है. शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि प्रवासी श्रमिकों को विदेश भेजने से पहले उनके अधिकारों, रोजगार अनुबंध और वेतन भुगतान व्यवस्था के बारे में पर्याप्त जानकारी देने के साथ-साथ उनकी सुरक्षा के लिए संस्थागत तंत्र मजबूत किया जाना चाहिए. विदेश से लौटने के बाद भी बकाया वेतन और अन्य देय राशि की वसूली के लिए प्रभावी सहायता व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिए. इस दिशा में इलेक्ट्रॉनिक भुगतान, नियोक्ता की जवाबदेही, सरकारी निगरानी और भारत तथा GCC देशों के बीच बेहतर संस्थागत सहयोग को महत्वपूर्ण कदम माना गया है. अध्ययन ने स्पष्ट किया है कि श्रमिकों का विदेश जाना केवल रोजगार और आय का विषय नहीं है, बल्कि उनके श्रम अधिकारों और सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा से भी सीधे जुड़ा हुआ है.
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