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"जिंदगी कोई सिनेमा नहीं है"
हम अक्सर जिंदगी को फिल्मों की तरह जीने की कोशिश करते हैं। पर्दे पर हीरो को कितनी भी बड़ी चोट लगे, वह उठता है, कपड़े झाड़ता है और फिर कहता है “मैं झुकूंगा नहीं।” तालियां बजती हैं, संगीत बजता है और कहानी आगे बढ़ जाती है। लेकिन असली जिंदगी में ऐसा नहीं होता। जिंदगी कोई सिनेमा नहीं है कि यहां जख्म होगा तो दुखेगा नहीं। यहां चोट लगती है तो दर्द होता है। कभी शरीर पर लगी चोट से ज्यादा दर्द किसी अपने के दिए हुए शब्द करते हैं। कोई अपना दूर हो जाए तो उसकी कमी महसूस होती है। ...
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