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करवा चौथ पर शाम 6-8 तक पूजा का शुभ मुहूर्त:शुक्रादित्य और बुधादित्य योग का संयोग; जानिए करवा माता की पूजा
करवा चौथ पर इस बार पूजा के लिए शाम 6 बजे से रात 8 बजे तक का समय शुभ बताया गया है। ज्योतिषाचार्य श्री राम शर्मा के मुताबिक, चंद्रमा को अर्घ्य देने का समय रात 7 बजकर 57 मिनट है। इस बार शुक्रादित्य और बुधादित्य योग का संयोग भी बन रहा है। ज्योतिष में शुक्र को प्रेम, वैवाहिक जीवन और दांपत्य सुख से जोड़कर देखा जाता है। ज्योतिषाचार्य के मुताबिक, इस संयोग को करवा चौथ के व्रत के लिए शुभ माना जा रहा है। हालांकि, मलमास के कारण इस साल पहली बार व्रत शुरू करने वाली महिलाओं को लेकर विशेष मान्यता बताई गई है। शुक्रादित्य और बुधादित्य योग का महत्व ज्योतिषाचार्य श्री राम शर्मा के मुताबिक, इस बार ग्रहों की युति से शुक्रादित्य और बुधादित्य योग बन रहे हैं। शुक्र को वैवाहिक जीवन, प्रेम और दांपत्य सुख का कारक माना जाता है। वहीं, सूर्य और बुध की युति से बुधादित्य योग बनता है। उनके मुताबिक, इन योगों के संयोग को करवा चौथ के लिए शुभ माना जा रहा है। पूजा का मुहूर्त और चंद्रमा को अर्घ्य देने का समय पूजा का मुहूर्त और चंद्रमा को अर्घ्य देने का समय ज्योतिषाचार्य श्री राम शर्मा के मुताबिक, करवा चौथ की पूजा शाम 6 बजे से रात 8 बजे तक की जा सकती है। चंद्रमा को अर्घ्य देने का समय रात 7 बजकर 57 मिनट बताया गया है। व्रती महिलाएं दिनभर निर्जला व्रत रखकर शाम को विधि-विधान से पूजा करती हैं और चंद्रमा के दर्शन के बाद अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। उन्होंने बताया कि पूजा में भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की आराधना भी की जाती है। करवा माता को पकवान, मिठाई, पूरी-सब्जी और अन्य व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। पूजा के बाद परिवार के लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं। अब पढ़े करवा चौथ की तीन कथाएं… पहली कथाः क्यों होती है करवा माता की पूजा ज्योतिषाचार्य श्री राम शर्मा ने बताया कि करवा माता की कथा एक पतिव्रता स्त्री से जुड़ी है। कथा के अनुसार, एक बार उनके पति नदी में स्नान कर रहे थे। तभी एक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया और उन्हें नदी की ओर खींचने लगा। पति ने अपनी पत्नी को पुकारा। आवाज सुनकर करवा माता वहां पहुंचीं। करवा माता ने अपनी साड़ी से सूत का धागा निकाला और अपने तपोबल से मगरमच्छ को बांध दिया। इसके बाद वे उसे लेकर यमराज के पास पहुंचीं और मगरमच्छ को दंड देने की मांग की। यमराज ने कहा कि मगरमच्छ की आयु अभी शेष है, इसलिए उसे दंड नहीं दिया जा सकता। इस पर करवा माता ने अपने तपोबल से यमराज को भस्म करने की चेतावनी दी। इसके बाद यमराज ने मगरमच्छ को दंड दिया और करवा माता को पति व परिवार के साथ सुखी जीवन का आशीर्वाद दिया। मान्यता है कि यह घटना कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को हुई थी। तभी से करवा चौथ का व्रत रखने की परंपरा शुरू हुई। दूसरी कथा: क्यों देते है चंद्रमा को अर्घ्य ज्योतिषाचार्य श्री राम शर्मा के मुताबिक, करवा चौथ पर चंद्रमा की पूजा को लेकर एक कथा भगवान गणेश से भी जुड़ी है। कथा के अनुसार, एक बार चंद्रमा ने भगवान गणेश के स्वरूप को देखकर उनका उपहास किया। इससे नाराज होकर गणेशजी ने चंद्रमा को कुरूप होने का श्राप दे दिया। श्राप मिलने के बाद चंद्रमा दुखी हुए। उन्होंने भगवान गणेश की आराधना की और उनसे क्षमा मांगी। इसके बाद गणेशजी ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि करवा चौथ के दिन उनकी पूजा के साथ चंद्रमा की भी पूजा की जाएगी। तीसरी कथा: क्या है चलनी में चांद देखने की प्रथा ज्योतिषाचार्य श्री राम शर्मा ने दूसरी कथा में सात भाइयों की बहन का प्रसंग बताया। कथा के अनुसार, एक महिला ने करवा चौथ का व्रत रखा था। दिनभर भूखे-प्यासे रहने के कारण शाम तक उसे परेशानी होने लगी। बहन की हालत देखकर उसके सात भाइयों से रहा नहीं गया। कथा के अनुसार, भाइयों ने दूर पेड़ के पीछे आग जलाई और छलनी की मदद से ऐसा दृश्य बनाया, जिससे वह चंद्रमा जैसा दिखाई देने लगा। भाइयों ने बहन से कहा कि चंद्रमा निकल आया है और वह व्रत खोल सकती है। बहन ने उस दृश्य को चंद्रमा समझकर अर्घ्य देने और व्रत खोलने की प्रक्रिया पूरी कर ली। मान्यता के अनुसार, समय से पहले व्रत खोलने के कारण उसके पति की तबीयत बिगड़ गई। बाद में महिला को अपनी गलती का पता चला। उसने चंद्रमा से क्षमा मांगी और प्रार्थना की। कथा के अनुसार, चंद्रमा प्रसन्न हुए और उसके पति को स्वस्थ होने का आशीर्वाद दिया। इस कथा के माध्यम से चंद्रमा के दर्शन और विधि-विधान से व्रत पूरा करने का महत्व बताया जाता है। लाल वस्त्र और सोलह शृंगार का महत्व ज्योतिषाचार्य श्री राम शर्मा के मुताबिक, करवा चौथ पर महिलाओं को लाल वस्त्र पहनकर सोलह शृंगार करने की परंपरा है। महिलाएं श्रद्धा और आस्था के साथ करवा माता की पूजा करती हैं। दिनभर व्रत रखने के बाद रात में चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं और पति के हाथों जल ग्रहण करके व्रत खोलती हैं। उन्होंने बताया कि पूजा में भगवान शिव, माता पार्वती और गणेशजी की आराधना की जाती है। करवा माता को भोग लगाने के बाद परिवार के लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं। करवा चौथ को पति-पत्नी के प्रेम, विश्वास और सुखी दांपत्य जीवन की कामना से जुड़ा पर्व माना जाता है।
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