Canada's #1 Community Marketplace
Home Blog News Announcements Pricing Register Free
politics

कलयुग का अंत: जब न धर्म बचेगा न इंसानियत, शिव पुराण में दर्ज हैं ये खौफनाक संकेत

📰 Ni News India 🕐 1 min read 📅 September 16, 2026 👁 3 views
कलयुग का अंत: जब न धर्म बचेगा न इंसानियत, शिव पुराण में दर्ज हैं ये खौफनाक संकेत
सनातन धर्म की काल-गणना और ब्रह्मांडीय समय-चक्र में समय को चार प्रमुख युगों—सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग—में विभाजित किया गया है। जिस प्रकार प्रकृति के नियम के अनुसार प्रत्येक जीवित प्राणी का जन्म, वृद्धि और अंत निश्चित है, ठीक उसी प्रकार ब्रह्मांड में प्रत्येक युग की एक निर्धारित आयु होती है और उसका अंत होकर नए युग का प्रारंभ होना तय है। वर्तमान में मानव सभ्यता जिस कालखंड से गुजर रही है, वह कलयुग का चरण है। लेकिन क्या आपने कभी यह विचार किया है कि जब कलयुग अपने चरम यानी अंतिम पड़ाव पर पहुंचेगा, तब यह धरती, मानव स्वभाव, सामाजिक रिश्ते और धर्म की व्यवस्था किस भयानक मोड़ पर आकर खड़ी हो जाएगी? अठारह महापुराणों में सर्वोच्च स्थान रखने वाले पवित्र 'शिव पुराण' में कलयुग के अंतिम समय के लक्षणों और समाज की दुर्दशा का ऐसा सूक्ष्म और सटीक विवरण मिलता है, जिसे पढ़कर किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाएं। आज के दौर में बढ़ती हिंसा, स्वार्थ और गिरते मानवीय मूल्यों को देखकर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि शास्त्रों में हजारों वर्ष पहले लिपिबद्ध की गई भविष्यवाणियां अक्षरशः सच साबित होने लगी हैं। विद्येश्वर संहिता में दर्ज इंसान का नैतिक पतन: देह को ही आत्मा समझने की होगी सबसे बड़ी भूल भगवान वेदव्यास द्वारा रचित शिव पुराण के प्रथम खंड 'विद्येश्वर संहिता' के पहले और दूसरे अध्याय में कलयुगी मानव की मानसिक और आत्मिक स्थिति का बड़ा ही मार्मिक और कठोर चित्रण किया गया है। शिव पुराण के अनुसार, घोर कलयुग आने पर मनुष्य पुण्य, सत्कर्म, परोपकार और पवित्रता से पूरी तरह विमुख हो जाएगा। समाज में सत्य की कोई कद्र नहीं रह जाएगी; लोग केवल असत्य, प्रपंच, कुतर्क और दूसरों की निंदा में आनंद लेने लगेंगे। मानव हृदय से दया, करुणा, क्षमा और परपीड़ा की भावनाएं पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी और उनकी सोच अत्यंत उग्र व हिंसक रूप धारण कर लेगी। शास्त्र में वर्णित है कि कलयुग के अंत में मनुष्य का स्वार्थ इस सीमा तक बढ़ जाएगा कि लोग अपने पड़ोसियों, मित्रों और यहां तक कि सगे संबंधियों की संपत्ति, जमीन और अधिकारों को बलपूर्वक या धोखे से हड़पने की ताक में रहेंगे। सबसे बड़ा आध्यात्मिक पतन यह होगा कि मनुष्य देहाभिमानी हो जाएगा; वह इस हाड़-मांस के नश्वर भौतिक शरीर को ही शाश्वत आत्मा समझने का घोर अज्ञान पाल बैठेगा। आध्यात्मिक चेतना, आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष जैसे दिव्य लक्ष्य पूरी तरह विस्मृत कर दिए जाएंगे और सारा जीवन केवल इंद्रिय सुखों की पूर्ति तक सीमित रह जाएगा। धर्म बना केवल दिखावे का पाखंड: ज्ञान का उपयोग सच खोजने नहीं, कुतर्क जीतने में करेंगे विद्वान शिव पुराण में इस बात की स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि कलयुग के अंतिम चरण में लोग अपने वर्ण, आश्रम और पारंपरिक धार्मिक मर्यादाओं को पूरी तरह तिलांजलि दे देंगे। वैदिक संध्यावंदन, यज्ञ, स्वाध्याय और ईश्वरीय साधना केवल दिखावे और बाह्य आडंबर का जरिया बनकर रह जाएंगे। लोग धार्मिक स्थलों पर भी मन की शांति या ईश्वर प्रेम के लिए नहीं, बल्कि अपनी प्रतिष्ठा और धन का प्रदर्शन करने पहुंचेंगे। शिक्षा और विद्या का पवित्र उद्देश्य पूरी तरह विकृत हो जाएगा। जिस विद्या को प्राचीन काल में मुक्ति और सदाचार का मार्ग माना जाता था, कलयुग में उस शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य केवल धन कमाना और भौतिक सुख-सुविधाएं जुटाना रह जाएगा। जो लोग समाज में बड़े विद्वान, ज्ञानी, विचारक और गुरु कहलाएंगे, वे भी अपने ज्ञान का उपयोग किसी परम सत्य की खोज या समाज के मार्गदर्शन के लिए नहीं करेंगे, बल्कि व्यर्थ के कुतर्क करने, शास्त्रों की गलत व्याख्या करने और दूसरों को बौद्धिक रूप से नीचा दिखाने में अपनी बौद्धिक ऊर्जा नष्ट करेंगे। गुरु और शिष्य की पावन परंपरा समाप्त हो जाएगी और आध्यात्मिक मार्गदर्शक केवल धनलोलुप व्यवसायियों की तरह आचरण करने लगेंगे। व्यापार में छल-कपट और मर्यादाओं का विनाश: अमीर लोग गलत व्यसनों में उड़ाएंगे अपनी दौलत कलयुग के चरम पर समाज का ढांचा पूरी तरह चरमरा जाएगा और आर्थिक व्यवस्था में नैतिक मूल्यों का सर्वथा लोप हो जाएगा। शिव पुराण के अनुसार, व्यापारिक लेन-देन में भारी बेईमानी, धोखाधड़ी और मिलावटखोरी का बोलबाला होगा। व्यापारी वर्ग अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के लालच में नाप-तौल में खुलेआम हेराफेरी करेंगे, खाद्य पदार्थों में विषैले तत्वों की मिलावट करेंगे और आम जनता की लाचारी का अनुचित लाभ उठाएंगे। ग्राहक और विक्रेता के बीच का पारस्परिक विश्वास पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। दूसरी ओर, जो लोग धनवान और शक्तिशाली होंगे, वे अपनी अकूत संपत्ति का उपयोग दीन-दुखियों की सहायता, चिकित्सा, धर्मशाला निर्माण या जनकल्याणकारी कार्यों में करने के बजाय जुआ, मदिरापान, वासना और अनैतिक व्यसनों में उड़ाएंगे। सामाजिक मर्यादाएं और कुलीनता की परिभाषाएं बदल जाएंगी। लोग खुद को समाज में सबसे ऊंचा, सभ्य और प्रभावशाली साबित करने की अंधी दौड़ में हर मानवीय नियम, कानून और परंपरा को तोड़ देंगे। जो व्यक्ति जितना अधिक धूर्त, चालाक और अहंकारी होगा, कलयुगी समाज में उसी को सबसे बुद्धिमान और सफल माना जाएगा। पारिवारिक रिश्तों में घुलेगा जहर: माता-पिता से नफरत और वैवाहिक जीवन में कड़वाहट की भविष्यवाणी शिव पुराण में कलयुग के जिस पहलू को सबसे अधिक भयावह बताया गया है, वह है पारिवारिक और रक्त संबंधों का पूर्ण विखंडन। पुराणों में लिखा है कि कलयुग के अंतिम समय में मनुष्य इतना क्रूर और कृतघ्न हो जाएगा कि वह अपने जन्मदाता माता-पिता से ही नफरत करने लगेगा। जिन माता-पिता ने अपनी संतान को पालने के लिए जीवन भर कष्ट सहे, बुढ़ापे में वही संतान उन्हें बोझ समझकर अपमानित करेगी, उनका त्याग कर देगी या उन्हें एकाकी जीवन जीने पर मजबूर कर देगी। पारिवारिक रिश्तों में विश्वास और आत्मीयता का स्थान केवल स्वार्थ और पैसों की गणना ले लेगी। वैवाहिक जीवन की पवित्रता पूरी तरह नष्ट हो जाएगी; पति-पत्नी के पावन संबंध में अविश्वास, ईगो, वासना और कड़वाहट हावी हो जाएगी। विवाह केवल एक कानूनी या शारीरिक समझौता बनकर रह जाएगा, जिसके चलते परिवार टूटेंगे और घरों में निरंतर कलह का वातावरण रहेगा। घर के बुजुर्गों, सास-ससुर और कुल के वरिष्ठ मार्गदर्शकों के प्रति सम्मान की भावना लगभग समाप्त हो जाएगी और लोग अपने ही सगे-संबंधियों को अपने तुच्छ लाभ के लिए धोखा देने में तनिक भी संकोच नहीं करेंगे। क्या सच होने लगी हैं शिव पुराण की भविष्यवाणियां? जानिए कलयुग की वास्तविक आयु और आने वाला समय आज के समय में जब हम अपने चारों तरफ नजर दौड़ाते हैं—अदालतों में अपनों के बीच चलते संपत्ति के मुकदमे, वृद्ध आश्रमों में अपने बच्चों की राह ताकते बेबस बुजुर्ग, समाचारों में मासूमों के साथ होने वाली जघन्य हिंसा, मिलावटखोरी और धर्म के नाम पर पाखंड—तो सहज ही ऐसा प्रतीत होता है कि शिव पुराण में वर्णित कलयुग के लक्षण हमारे सामने प्रत्यक्ष घटित हो रहे हैं। यह स्थिति इस बात का प्रमाण है कि समाज नैतिक रूप से पतन की गहरी खाई में उतर रहा है। हालांकि, वैदिक ज्योतिष और सनातन काल-गणना के अनुसार कलयुग की कुल आयु 4,32,000 मानव वर्ष निर्धारित की गई है। द्वापर युग के अंत और भगवान श्रीकृष्ण के परमधाम गमन के साथ लगभग 5,100 वर्ष पूर्व कलयुग का आरंभ हुआ था। इस गणना के आधार पर वर्तमान समय कलयुग का केवल प्रथम चरण (शुरुआती काल) ही है। जब कलयुग का प्रथम चरण ही इतना पतनकारी और कष्टप्रद दिख रहा है, तो सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि लाखों वर्षों बाद जब कलयुग का चतुर्थ चरण और अंतिम समय आएगा, तब स्थितियां कितनी अधिक प्रलयंकारी होंगी। शास्त्रों के अनुसार, जब धरती पर पाप अपनी चरम सीमा को पार कर जाएगा और धर्म का एक भी अंश शेष नहीं रहेगा, तब अधर्म का नाश करने और सतयुग की पुनर्स्थापना के लिए स्वयं भगवान कल्कि का अवतार होगा। इसलिए आज के संक्रांति काल में भी स्वयं को सत्संग, शिव भक्ति, सत्य और सदाचार से जोड़कर रखना ही कलयुग के दुष्प्रभावों से बचने का एकमात्र अचूक मार्ग है।
Read full article on Ni News India

Related News

🤖
GoBazaar Assistant
Search listings, jobs, events & more
👋 Hi! I can help you find anything on GoBazaar.
Try asking me something like:
"Room for rent under $800 in Calgary"
Select Location
All Canada
Alberta
British Columbia
Manitoba
New Brunswick
Nova Scotia
Ontario
Quebec
Saskatchewan