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'नेहरू या कोई भी हमारी-संस्कृति को सेंसर करने वाले कौन':गीतकार मनोज मुंतशिर ने वंदे मातरम् पर नेहरू से लेकर नेता प्रतिपक्ष पर कसा तंज
उज्जैन में 17 से 19 सितंबर तक तीन दिवसीय ‘युवा धर्म संसद’ का आयोजन किया जा रहा है। दूसरे दिन शुक्रवार को देवास रोड स्थित गीता भवन में व्याख्यान सत्र हुआ। इसमें देशभर से करीब 1700 युवा छात्र-छात्राएं शामिल हुए। कार्यक्रम में पूज्य अवधेशानंद गिरि जी महाराज, आचार्य महामंडलेश्वर, जूना अखाड़ा, प्रसिद्ध पटकथा लेखक एवं गीतकार मनोज मुंतशिर, प्रो. श्रीनिवास बरखेड़ी, कुलपति, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय और मातृश्री स्मृति अनंतलक्ष्मी जी, सह-संस्थापिका एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शिका, अनादि फाउंडेशन शामिल हुए। मनोज मुंतशिर ने करीब 20 मिनट तक युवाओं को धर्म, शिक्षा, परिवार, संस्कृति और स्वामी विवेकानंद के विचारों से जुड़े विषयों पर संबोधित किया। उन्होंने रामायण और महाभारत का जिक्र करते हुए युवाओं से धर्म और संस्कृति से जुड़ने की अपील की। ‘युवाओं के हाथ में भारत का भविष्य सुरक्षित’ मनोज मुंतशिर ने दैनिक भास्कर से बातचीत में कहा कि युवाओं के हाथ में भारत का भविष्य सुरक्षित है। यह जेन जी धर्म-कर्म के मार्ग पर चलता रहेगा। उन्होंने कहा कि जब तक जेन जी हमारे साथ है, भारत का कोई बाल बांका नहीं कर सकता। वंदे मातरम् को लेकर नेहरू और कांग्रेस पर तंज वंदे मातरम् को लेकर मनोज मुंतशिर ने कांग्रेस और नेहरू पर तंज कसा। उन्होंने कहा कि 15 अगस्त को उन्होंने देखा कि नेता प्रतिपक्ष ने चलता हुआ वंदे मातरम् इसलिए रुकवा दिया, क्योंकि नेहरू जी 1936 में कहकर गए थे कि सिर्फ दो अंतरे गाए जाएंगे, बाकी चार नहीं। उन्होंने कहा, “नेहरू जी या कोई भी जी होते कौन हैं हमारी संस्कृति को सेंसर करने वाले।” मनोज ने कहा कि 1896 में कांग्रेस के पहले अधिवेशन में पहली बार वंदे मातरम् गाया गया था और 1937 तक यह पूरा गाया जाता रहा। उनके अनुसार, 1937 में इस पर आपत्ति जताई गई और इसके बाद चार अंतरे हटाने की बात स्वीकार की गई। उन्होंने सवाल उठाया कि एक तरफ हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई के नारे लगाए जाते हैं और दूसरी तरफ वंदे मातरम् नहीं गाया जाता, इसमें क्या तर्क है? ‘परिवार विखंडित हो रहे, भाइयों की मुलाकात कोर्ट में हो रही’ परिवारों के विखंडन पर मनोज ने कहा कि आज भाई-भाई की मुलाकात दो-तीन साल में होती है और कई बार वे कोर्ट में मुकदमे की तारीख पर मिलते हैं। उन्होंने युवाओं से परिवार और संस्कृति को संभालने की अपील की। उन्होंने कहा कि रोमन, मिस्र, मेसोपोटामिया, ग्रीक और पर्शियन सभ्यताएं खत्म हो गईं, क्योंकि वे अपनी संस्कृति, साहित्य और इतिहास को संभालकर नहीं रख पाईं। उन्होंने युवाओं से कहा कि भारत को ऐसी गलती नहीं करनी चाहिए। ‘सर्वे संतु निरामया’ का दिया उदाहरण मनोज ने कोरोना काल का उदाहरण देते हुए कहा कि जब जिंदगी की सांस टूटने लगी, तब भारत ने वैक्सीन बनाई। उन्होंने कहा कि वैक्सीन के पर्चे पर लिखा था- ‘सर्वे संतु निरामया’, यानी ईश्वर सभी प्राणियों पर दया करे। ‘देश पहले, दिशा बाद में’ युवाओं को संबोधित करते हुए मनोज मुंतशिर ने कहा कि किसी व्यक्ति की पहचान सबसे पहले भारतीय के रूप में होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि उन्हें तब तकलीफ होती है, जब लोग अपना परिचय ‘नॉर्थ इंडियन’ या ‘साउथ इंडियन’ के रूप में देते हैं। उन्होंने कहा, “आपका परिचय होना चाहिए- ‘I am an Indian from North’ या ‘I am an Indian from South’। देश पहले, दिशा बाद में।” उन्होंने युवाओं से देश और भारत की मिट्टी को सबसे ऊपर रखने का संदेश दिया।
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