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आज का एक्सप्लेनर:क्या अब इजराइल में मुस्लिमों का दबदबा होगा; नेतन्याहू बहुमत से 7 सीट पीछे, अरब पार्टियां कैसे बनीं किंगमेकर
इजराइल में किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिल रहा है। सत्ताधारी पीएम नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत से 7 सीटें पीछे और विपक्षी नेता आइजेनकोट का गठबंधन 14 सीटें पीछे रह गया। अब 17 सीटें जीत रहीं अरब पार्टियां, इजराइल में किंग मेकर की भूमिका में हैं। नतीजों की घोषणा 4 नवंबर को होगी। इजराइल का नया पीएम कैसे और कौन बनेगा, क्या इजराइल की 20% मुस्लिम आबादी का दबदबा बढ़ेगा; आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: इजराइल में किसी को बहुमत नहीं मिला, अब सरकार कैसे बनेगी? जवाबः इसराइल की संसद नेसेट में 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए 61 सीटें चाहिए। इजराइल के 78 साल के इतिहास में किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला। इसबार भी स्थिति वैसी ही है। अब सरकार बनने की प्रक्रिया में 4 चीजें हैं… 1. राष्ट्रपति की भूमिका: राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग सभी पार्टियों के नेताओं से बात करेंगे। फिर वे उस नेता को सरकार बनाने का न्योता देंगे, जिसके पास बहुमत जुटाने की सबसे अच्छी संभावना हो। आमतौर पर बड़ी पार्टी के नेता को मौका मिलता है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। 2009 में राष्ट्रपति शिमोन पेरेज ने बेंजामिन नेतन्याहू को सरकार बनाने का मौका दिया था, जबकि उनकी लिकुड पार्टी को कदीमा पार्टी से कम वोट मिले थे। 2. सहयोगी जुटाने के लिए समय: पहले नेता को 28 दिन मिलते हैं। राष्ट्रपति चाहें तो 14 दिन और दे सकते हैं, यानी अधिकतम 42 दिन। इस दौरान उसे सहयोगी जुटाने होते हैं। फिर नेसेट, यानी इजराइली संसद में मंत्रिमंडल और नीतियां पेश कर 61 सांसदों का समर्थन साबित करना होता है। 3. बहुमत नहीं तो दूसरे को मौका: पहला नेता नाकाम रहा, तो मौका किसी दूसरे नेता को मिलेगा। वह भी विफल रहा, तो अल्पमत सरकार भी बन सकती है। जैसे 2021 में सिर्फ 7 सांसदों वाली पार्टी के नेता बेनेट विपक्ष के समर्थन से पीएम बने। 4. दोबारा चुनावः गठबंधन की बातचीत में हफ्तों लग सकते हैं। सभी कोशिशें नाकाम रहीं, तो नेसेट भंग मानी जाती है। 90 दिन के भीतर नए चुनाव होते हैं। ऐसी स्थिति में 2019 से 2022 के बीच 5 बार चुनाव हुए थे। जब तक नई सरकार नहीं बनती, नेतन्याहू अंतरिम प्रधानमंत्री बने रहेंगे। हालांकि इसबार अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाई जा सकती है। सवाल-2: किंग मेकर बनीं अरब पार्टियां कौन, इनका चुनावी इतिहास कैसा है? जवाब: इजराइल में करीब 21 लाख अरब रहते हैं। इनका प्रतिनिधित्व करने वाली 4 अरब पार्टियां हैं… अब इनका चुनावी इतिहास… सवाल-3: किंगमेकर बनीं अरब पार्टियां इस बार किसे समर्थन देंगी? जवाबः 3 सिनैरियो बन रहे हैं… 1. अरब पार्टियां आइजेनकोट को समर्थन दे सकती हैं 2. जॉइंट लिस्ट, आइजेनकोट को बाहर से समर्थन कर सकती है 3. नेतन्याहू, रा’आम जैसे दलों के समर्थन से सरकार बना सकते हैं इजराइल में सरकार बनाने का गणित इस पर भी निर्भर करता है कि राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग सरकार बनाने के लिए पहले किस पार्टी के नेता को बुलाते हैं। वह उस पार्टी को भी मौका दे सकते हैं, जो सबसे बड़ी नहीं है, लेकिन दूसरी पार्टियों से समर्थन से संसद में बहुमत साबित करने की ज्यादा संभावना रखती है। राष्ट्रपति से चर्चा के दौरान अरब पार्टियां किसी उम्मीदवार की सिफरिश कर सकती हैं, भले ही बाद में वे सरकार में शामिल न हों। सवाल-3: कट्टर यहूदी देश इजराइल में 21 लाख मुस्लिम कैसे रहते हैं? जवाबः 1948 में इजराइल बनने के दौरान करीब 7 लाख फिलिस्तीनी विस्थापित हुए थे। करीब डेढ़ लाख अरब इजराइल की सीमा में रह गए। इन्हीं अरबों की आगे की पीढ़ियां इजराइली अरब नागरिक बनीं। आज इजराइल की कुल करीब 1 करोड़ की आबादी में 21%, यानी करीब 21 लाख अरब हैं। इनमें 18.5 लाख अरब मुस्लिम और करीब 2.5 लाख ईसाई शिया द्रुज शामिल हैं। ज्यादातर इजराइली अरब 3 इलाकों में सिमटे हुए हैं- उत्तरी इजराइल का गलील, मध्य इजराइल का ट्रायंगल और दक्षिणी इजराइल का नेगेव इलाका। कुछ अरब हाइफा, लॉड, अक्का, रामले जैसे शहरों में भी रहते हैं। पूर्वी यरुशलम में ऐसे अरब भी रहते हैं, जिनके पास इजराइली नागरिकता नहीं है। वेस्ट बैंक के यहूदी वोट डाल सकते हैं, लेकिन अरब नहीं। बाकी इजराइली अरबों को वोट देने का अधिकार है और कानूनी रूप से यहूदियों के बराबर ही नागरिक माने जाते हैं, लेकिन इनके जमीनी हालात ठीक नहीं हैं… सवाल-4: क्या सरकार में शामिल होने से इजलाइल में मुस्लिमों का दबदबा बढ़ेगा? जवाबः चुनाव के दौरान अरब वोटरों का टर्नआउट यहूदी वोटरों से कम रहता है। 2022 में पूरे इजराइल में 70% वोट पड़े, जबकि अरब इलाकों में वोटिंग टर्नआउट करीब 53% रहा था। इस बार इन इलाकों में 80% तक वोटिंग हुई है। मंसूर अब्बास ने कहा है कि अरब वोटरों का ज्यादा टर्नआउट, निराशा को उम्मीद में बदलने का संकेत है। मोहम्मद दरावशे कहते हैं कि अरबों के लिए चुनाव का पहला उद्देश्य पूरी नागरिकता हासिल करना और पॉलिटिकल सिस्टम में हिस्सेदारी लेना है। हम इजराइल के मेहमान नहीं, यहां के बाशिंदे हैं। दरावशे के मुताबिक, ‘अगर अरब पार्टियों के साथ मिलकर आइजेनकोट की सरकार बनी, तो कोई चमत्कार नहीं होगा और न ही अरबों की सारी दिक्कतें खत्म हो जाएंगी, लेकिन इससे अरबों के नागरिक अधिकार से जुड़े मुद्दों में अहम सुधार हो सकते हैं। राजनीतिक हिस्सेदारी भी बढ़ेगी। ’ ये खबर भी पढ़ें… आज का एक्सप्लेनर:नेतन्याहू सर्वे में पिछड़ रहे, क्या फिर भी प्रधानमंत्री बन जाएंगे; इजराइल में वोटिंग आज, भारत से कितने अलग होते हैं चुनाव ओपिनियन पोल और अब तक के रुझानों के मुताबिक, बहुमत से पीछे रहने के बावजूद नेतन्याहू के 7वीं बार प्रधानमंत्री बनने का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होगा। इसकी वजह है इजराइल का अनोखा चुनावी सिस्टम। पूरी खबर पढ़ें…
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