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चित्तौड़गढ़ में बड़े नेताओं को झटका:कांग्रेस के महेंद्र सिंह मेड़तिया की चौथी बार जीत, शहर में बदले राजनीति में कई पुराने समीकरण
चित्तौड़गढ़ नगर परिषद चुनाव के नतीजों ने शहर की राजनीति में कई पुराने समीकरण बदल दिए हैं। चुनाव परिणाम सिर्फ नई परिषद चुनने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि कई ऐसे नेताओं की राजनीतिक स्थिति भी बदल गई, जिन्हें चुनाव से पहले मजबूत दावेदार माना जा रहा था। कुछ पुराने चेहरे अपनी पकड़ बनाए रखने में सफल रहे, तो कुछ को मतदाताओं ने इस बार मौका नहीं दिया। नतीजों ने यह साफ कर दिया कि इस चुनाव में पार्टी के साथ-साथ उम्मीदवार की व्यक्तिगत पहचान, क्षेत्र में पकड़ और स्थानीय मुद्दों का भी बड़ा असर रहा। सबसे ज्यादा चर्चा वार्ड नंबर 17 के मुकाबले की रही। यहां भाजपा और कांग्रेस के दो बड़े नेता आमने-सामने थे। कांग्रेस के महेंद्र सिंह मेड़तिया ने लगातार दूसरी बार इसी वार्ड से और लगातार चौथी बार जीत दर्ज की, जबकि भाजपा के पूर्व पालिकाध्यक्ष और पूर्व यूआईटी चेयरमैन सुरेश झंवर को सिर्फ 26 वोटों से हार का सामना करना पड़ा। इस मुकाबले को दोनों दलों की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा रहा था। ऐसे में इतने कम अंतर से हुई हार ने भाजपा के खेमे में भी चर्चा बढ़ा दी। वार्ड 4, 6 और 7 में पुराने चेहरों की अलग-अलग कहानी नगर परिषद चुनाव में वार्ड नंबर 4, 6 और 7 के परिणाम भी काफी चर्चा में रहे। वार्ड 4 से कांग्रेस के पूर्व पालिकाध्यक्ष रमेश नाथ ने लगातार तीसरी बार जीत दर्ज कर अपना दबदबा कायम रखा। उन्होंने भाजपा के दिलीप सिंह को हराया। वहीं दूसरी ओर वार्ड 6 से कांग्रेस को बड़ा झटका लगा। कांग्रेस के पूर्व उपसभापति कैलाश पंवार लगातार छह बार पार्षद का चुनाव जीत चुके थे, लेकिन इस बार उन्हें भाजपा के दिनेश गवारिया से हार का सामना करना पड़ा। कैलाश पंवार की हार को कांग्रेस के लिए बड़ा नुकसान माना जा रहा है। वहीं वार्ड 7 में भी पंवार परिवार को हार मिली। कैलाश पंवार की पत्नी और लगातार दो बार पार्षद रही सावित्री पंवार इस बार भाजपा की पूजा खटीक से चुनाव हार गईं। इन परिणामों ने यह संकेत दिया कि इस बार मतदाताओं ने कई पुराने चेहरों के बजाय नए विकल्पों पर भी भरोसा जताया। कई मजबूत उम्मीदवार भी नहीं बचा पाए अपनी सीट चुनाव में कई ऐसे उम्मीदवार भी हार गए, जिनकी जीत को लेकर पहले से चर्चा थी। भाजपा के वरिष्ठ नेता हरीश ईनाणी वार्ड 12 से चुनाव नहीं जीत सके। वहीं वार्ड 54 से मजबूत दावेदार माने जा रहे बृज किशोर साहू को भी हार का सामना करना पड़ा। दूसरी ओर भाजपा के कई उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। वार्ड 25 से शैलेन्द्र झंवर और वार्ड 22 से जगदीप सिंह सलूजा चुनाव जीतने में सफल रहे। वार्ड 29 भी पूरे चुनाव में चर्चा में रहा, क्योंकि यह विधायक चंद्रभान सिंह आक्या और सांसद सीपी जोशी का गृह वार्ड है। यहां भाजपा प्रत्याशी राजेंद्र जांगिड़ ने जीत हासिल कर पार्टी की उम्मीद कायम रखी। वहीं कांग्रेस के पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह जाड़ावत के गृह वार्ड 14 में भी भाजपा ने जीत दर्ज की। बागियों और निर्दलीयों ने बिगाड़ा दोनों दलों का गणित इस चुनाव में बागी और निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी भाजपा और कांग्रेस दोनों के चुनावी समीकरण प्रभावित किए। वार्ड 59 में भाजपा से टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले प्रमोद राजपुरोहित ने जीत हासिल कर अपनी ताकत दिखाई। इसी तरह वार्ड 30 से पारसमल ने निर्दलीय चुनाव जीता। वार्ड 18 और 41 से भी निर्दलीय प्रत्याशी जीतने में सफल रहे। इन नतीजों से साफ हुआ कि कई वार्डों में मतदाताओं ने पार्टी से ज्यादा उम्मीदवार को प्राथमिकता दी। बागियों की जीत ने भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने संगठन और टिकट वितरण को लेकर नई चुनौती खड़ी कर दी है। शुरुआत में पीछे रही कांग्रेस, बाद के वार्डों में की वापसी मतगणना के शुरुआती दौर में कांग्रेस काफी पीछे दिखाई दे रही थी। पहले 14 वार्डों में कांग्रेस को सिर्फ तीन सीटें मिलीं। इसके बाद 15 से 30 वार्डों के बीच कांग्रेस के खाते में पांच सीटें आईं। 31 से 40 वार्डों के बीच भी कांग्रेस ने चार सीटों पर जीत दर्ज की। शुरुआती परिणामों के बाद कांग्रेस के लिए स्थिति कमजोर नजर आ रही थी, लेकिन 41 से 55 वार्डों के परिणाम आने के बाद तस्वीर बदली। अंतिम परिणाम में भाजपा को 33 सीटें, कांग्रेस को 23 सीटें और निर्दलीय उम्मीदवारों को 4 सीटें मिलीं। नगर परिषद में बोर्ड बनाने के लिए 31 सीटों की जरूरत थी। ऐसे में भाजपा का बोर्ड बनना तय हो गया है। अब सबसे ज्यादा चर्चा सभापति और उपसभापति पद को लेकर शुरू हो गई है। भाजपा में सभापति पद के लिए इन नामों पर चर्चा भाजपा का बोर्ड तय होने के बाद सभापति पद के लिए कई नामों की चर्चा शुरू हो गई है। फिलहाल अनिल ईनाणी, शैलेंद्र झंवर, सुदर्शन रामपुरिया और छोटू सिंह शेखावत के नाम सभापति पद के दावेदारों में शामिल बताए जा रहे हैं। वहीं उपसभापति पद के लिए भोलाराम प्रजापत का नाम चर्चा में है। 1. अनिल ईनाणी अनिल ईनाणी इससे पहले पार्षद रह चुके हैं और इस बार उन्हें सभापति पद का दावेदार माना जा रहा है। वे विधायक चंद्रभान सिंह आक्या के काफी करीबी माने जाते हैं। उन्होंने वार्ड 15 से चुनाव लड़ा और उन्हें 696 वोट मिले। उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी हेमंत संत को 379 मतों से हराया। 2. शैलेंद्र झंवर वार्ड 25 से जीत दर्ज करने वाले शैलेंद्र झंवर भी सभापति पद की दावेदारी कर सकते हैं। उन्होंने 803 वोट हासिल किए। उन्होंने कांग्रेस के अभिषेक नलवाया को 629 वोटों से हराया। उन्हें भी विधायक के करीबी नेताओं में माना जाता है। 3. सुदर्शन रामपुरिया सुदर्शन रामपुरिया भाजपा के उपाध्यक्ष रह चुके हैं। उन्हें चित्तौड़गढ़ नगर मंडल अध्यक्ष भी बनाया गया था, लेकिन कुछ ही दिनों बाद उनसे यह पद लेकर उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई थी। बाद में उन्होंने उस पद से इस्तीफा दे दिया था।उन्होंने वार्ड 31 से चुनाव लड़ा। उन्हें 697 वोट मिले और उन्होंने कांग्रेस के दिनेश चंद्र गुर्जर को 112 वोटों से हराया। 4. छोटू सिंह शेखावत छोटू सिंह शेखावत भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं और सभापति पद के दावेदारी कर सकते हैं। वे छह बार पार्षद का चुनाव लड़ चुके हैं और चार बार पार्षद रह चुके हैं। इस बार भी उन्होंने जीत दर्ज की। उन्होंने वार्ड 13 से चुनाव लड़ा। उन्हें 508 वोट मिले। उन्होंने निर्दलीय आशुतोष शर्मा को 416 वोटों से हराया। उपसभापति पद के लिए भोलाराम प्रजापत का नाम चर्चा में भोलाराम प्रजापत चार बार पार्षद रह चुके हैं। उन्हें विधायक चंद्रभान सिंह आक्या का करीबी माना जाता है। उन्होंने वार्ड 11 से चुनाव लड़ा। उन्हें 459 वोट मिले। उन्होंने कांग्रेस के सुरेंद्रनाथ योगी को 43 वोटों से हराया। कुल मिलाकर नगर परिषद चुनाव के परिणामों ने चित्तौड़गढ़ की राजनीति में नई तस्वीर सामने रख दी है। भाजपा के बोर्ड बनने के बाद अब सबकी नजर सभापति के नाम पर है। आने वाले दिनों में पार्टी किस चेहरे को जिम्मेदारी देती है, इससे शहर की राजनीति की आगे की दिशा तय होगी।
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