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इंदौर की सड़कों पर सुधार क्यों नहीं दिख रहा, हाई कोर्ट ने ट्रैफिक व्यवस्था पर अधिकारियों को लगाई कड़ी फटकार
इंदौर. बिगड़ती ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक बार फिर प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है. शहर में लगातार लग रहे जाम, गलत और बिना नंबर प्लेट के वाहनों की आवाजाही, हूटर व सायरन लगी गाड़ियों और भारी वाहनों के प्रवेश को लेकर कोर्ट ने अधिकारियों से सीधे सवाल किए. सुनवाई के दौरान न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सड़कों पर किए जा रहे काम का असर दिखाई नहीं दे रहा और ट्रैफिक की स्थिति में भी अपेक्षित सुधार नजर नहीं आ रहा है. ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर शहर में लंबित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान अधिवक्ताओं ने प्रशासन के दावों और जमीनी स्थिति के बीच अंतर का मुद्दा उठाया. कोर्ट ने अधिकारियों से यह भी जानना चाहा कि पूर्व में दिए गए निर्देशों पर वास्तव में कितना अमल हुआ है और उसका परिणाम सड़कों पर क्यों दिखाई नहीं दे रहा. चालान से आगे बढ़कर व्यवस्था सुधारने की जरूरत सुनवाई के दौरान शहर में ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन का मुद्दा प्रमुखता से उठा. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मनीष यादव ने कोर्ट को बताया कि गलत नंबर प्लेट और बिना नंबर वाली गाड़ियां अभी भी सड़कों पर दिखाई देती हैं. हूटर और सायरन लगी गाड़ियों के खिलाफ भी पूर्व में कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे, लेकिन स्थिति में अपेक्षित बदलाव नहीं आया. इस पर न्यायालय ने टिप्पणी की कि केवल चालान बनाने से ट्रैफिक व्यवस्था ठीक नहीं होगी. यदि नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहन लगातार सड़कों पर दिखाई दे रहे हैं और जाम की समस्या बनी हुई है तो कार्रवाई की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है. कोर्ट ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट के सामने तक ऐसी गाड़ियां नजर आती हैं. ऐसे में अधिकारियों की निगरानी और कार्रवाई के दावों की वास्तविकता पर भी सवाल खड़े होते हैं. हूटर और सायरन वाली गाड़ियों पर निर्देश का पालन कितना हुआ हाई कोर्ट के समक्ष यह भी बताया गया कि पिछले महीनों में हूटर और सायरन लगी गाड़ियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे. इसके बावजूद ऐसी गाड़ियों की मौजूदगी सामने आने की बात कही गई. अदालत ने अधिकारियों से अपेक्षा की कि पूर्व में जारी निर्देशों के पालन की वास्तविक स्थिति बताई जाए. न्यायालय के लिए केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि कार्रवाई की जा रही है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि उसका असर शहर के यातायात पर दिखाई दे. याचिकाकर्ता पक्ष का आरोप था कि प्रशासन की ओर से समय-समय पर नई तकनीक और नए उपायों की जानकारी दी जाती है, लेकिन सड़कों पर आम नागरिकों को उसका प्रभाव दिखाई नहीं देता. भारी वाहनों की एंट्री पर भी कोर्ट सख्त शहर में ट्रैफिक जाम की समस्या के बीच भारी वाहनों की आवाजाही को लेकर भी हाई कोर्ट ने अधिकारियों से सवाल किया. न्यायालय ने पूछा कि पुलिस प्रशासन ने भारी वाहनों के शहर में प्रवेश को लेकर क्या कदम उठाए हैं. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के उन निर्देशों का भी संदर्भ आया, जिनमें शहरों में भारी वाहनों के प्रवेश को नियंत्रित करने की बात कही गई है. हाई कोर्ट ने प्रशासन से जानना चाहा कि इस दिशा में स्थानीय स्तर पर क्या व्यवस्था लागू की गई है और उसका पालन किस तरह कराया जा रहा है. भारी वाहनों की आवाजाही को शहर के यातायात दबाव से जोड़कर देखा जा रहा है. ऐसे में प्रवेश के समय, मार्ग और निगरानी व्यवस्था को लेकर प्रशासन से स्पष्ट जानकारी मांगी गई है. आधा दर्जन याचिकाओं में उठ रहा ट्रैफिक का मुद्दा इंदौर की यातायात व्यवस्था को लेकर हाई कोर्ट में करीब आधा दर्जन याचिकाएं लंबित हैं. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि शहर की ट्रैफिक समस्या केवल किसी एक सड़क या चौराहे तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक स्तर पर न्यायालय के समक्ष उठाई जा रही है. मंगलवार को पूर्व पार्षद महेश गर्ग की याचिका पर सुनवाई हुई. उनकी ओर से अधिवक्ता मनीष यादव ने कोर्ट के समक्ष शहर की यातायात व्यवस्था और पूर्व निर्देशों के पालन से जुड़े तथ्य रखे. अधिवक्ता की ओर से कहा गया कि कोर्ट पहले भी ट्रैफिक सुधार को लेकर अलग-अलग निर्देश दे चुका है, लेकिन उनके गंभीरता से पालन की स्थिति स्पष्ट नहीं है. प्रशासन की ओर से तकनीक आधारित समाधान के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन जमीनी स्थिति में अपेक्षित परिवर्तन नहीं दिखाई दे रहा. एआई और ड्रोन के दावों पर भी कोर्ट की नजर सुनवाई के दौरान अधिवक्ता पक्ष ने कहा कि ट्रैफिक सुधार के लिए कभी एआई तकनीक तो कभी ड्रोन के इस्तेमाल की बात कही जाती है. इन तकनीकी उपायों को लेकर प्रशासन की ओर से दावे किए जाते हैं, लेकिन उनका वास्तविक परिणाम नागरिकों को दिखाई नहीं दे रहा. याचिकाकर्ता पक्ष ने इसे प्रशासन की ओर से किए जा रहे ऐसे दावों से जोड़कर देखा, जिनका असर सड़कों पर नजर नहीं आता. अदालत के सामने मूल सवाल यही रहा कि तकनीक और संसाधनों के इस्तेमाल के बावजूद ट्रैफिक की समस्या में सुधार क्यों नहीं हो रहा. न्यायालय ने भी इस बात पर चिंता जताई कि शहर की सड़कों पर कोई प्रभावी काम दिखाई नहीं दे रहा है. इससे संकेत है कि अगली सुनवाई में प्रशासन को केवल योजनाओं की जानकारी देने के बजाय उनके क्रियान्वयन और परिणाम का विवरण प्रस्तुत करना होगा. 660 चौराहों पर सीसीटीवी और जवानों की तैनाती का दावा पूर्व में हाई कोर्ट ने प्रशासन से यह जानकारी मांगी थी कि इंदौर में कितने सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं और कितने पुलिस जवान ट्रैफिक व्यवस्था संभालने के लिए तैनात हैं. इसके जवाब में शासन की ओर से न्यायालय को बताया गया कि पुलिस ने 660 चौराहों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए हैं. शासन ने यह भी बताया था कि सभी चौराहों पर जवानों की तैनाती की गई है. इन दावों के बावजूद यदि शहर में जाम और यातायात अव्यवस्था बनी हुई है तो न्यायालय अब यह जानना चाहता है कि उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है. यही वजह है कि अगली सुनवाई में प्रशासन से पूर्व निर्देशों के पालन की विस्तृत जानकारी मांगी गई है. जमीन पर कार्रवाई नहीं होने का आरोप याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से अधिवक्ता मनीष यादव और अनस मकरानी ने कहा कि प्रशासन की ओर से दावे तो किए जा रहे हैं, लेकिन जमीन पर कार्रवाई नजर नहीं आ रही. उनका कहना था कि पूर्व में दिए गए निर्देशों के बावजूद ट्रैफिक की स्थिति में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं हुआ है. इस तर्क के बाद न्यायालय ने प्रशासन से विस्तृत जवाब मांगा है. अब अधिकारियों को यह बताना होगा कि पिछली सुनवाई के बाद कौन-कौन से कदम उठाए गए, किन निर्देशों का पालन हुआ और किन पर कार्रवाई अभी बाकी है. अगली सुनवाई में देना होगा विस्तृत जवाब हाई कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर वाले सप्ताह में निर्धारित की है. प्रशासन को तब तक विस्तृत जवाब प्रस्तुत करना होगा. इसमें पूर्व में दिए गए न्यायालयीन निर्देशों पर की गई कार्रवाई की जानकारी भी शामिल करनी होगी. अदालत के रुख से साफ है कि अब केवल योजनाओं, तकनीकी संसाधनों या चालान की संख्या बताने से काम नहीं चलेगा. प्रशासन को यह भी बताना होगा कि इन उपायों से शहर के यातायात में क्या वास्तविक सुधार आया. इंदौर जैसे तेजी से बढ़ते शहर में ट्रैफिक प्रबंधन का मुद्दा लगातार गंभीर होता जा रहा है. ऐसे में हाई कोर्ट की सुनवाई अब इस बात पर केंद्रित होती दिखाई दे रही है कि पुलिस और प्रशासन की ओर से किए जा रहे प्रयासों का वास्तविक असर सड़कों पर कब दिखाई देगा. 28 सितंबर वाले सप्ताह की सुनवाई में प्रशासन का विस्तृत जवाब इस मामले में अगली दिशा तय करेगा.
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