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जींस पहनना महिला की... दिल्ली हाई कोर्ट ने उत्पीड़न मामले में पीड़िता के कपड़ों पर वकील के सवालों पर लगाई फटकार
Delhi High Court Slams Lawyer: अदालत में जिरह का अधिकार बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन यह किसी गवाह या पीड़िता की गरिमा को ठेस पहुंचाने का लाइसेंस नहीं हो सकता. दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को एक महिला के साथ उत्पीड़न के मामले में बचाव पक्ष के वकील की जिरह के तरीके पर कड़ी नाराजगी जताते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि पीड़िता के कपड़ों को लेकर पूछे गए सवाल पूरी तरह अप्रासंगिक थे और ऐसा लगता है कि उनका उद्देश्य पीड़िता को शर्मिंदा करना, अपमानित करना और उसके चरित्र का नैतिक मूल्यांकन करना था. मामले में जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी को राहत दी गई थी. हाई कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354(1)(i) के तहत दोषी ठहराया. हालांकि, कोर्ट ने POCSO एक्ट की धारा 10 के तहत दोष तय नहीं किया, क्योंकि अभियोजन पक्ष पीड़िता की उम्र और उसके नाबालिग होने को ठीक तौर से साबित नहीं कर सका. ऐसे में चलिए विस्तार से समझें पूरा मामला क्या है और कोर्ट को कपड़ों को लेकर बचाव पक्ष के वकील को क्या कहा. क्या है पूरा मामला? अभियोजन के मुताबिक, आरोपी पीड़िता का बार-बार पीछा करता था और उसके खिलाफ अभद्र टिप्पणियां करता था. 17 जुलाई 2013 को जब पीड़िता घर लौट रही थी, तब आरोपी उसके पास आया और कथित तौर पर उसके गालों को छुआ. विरोध करने पर उसने उसे धमकी भी दी. दिल्ली पुलिस ने ट्रायल कोर्ट के 2014 के फैसले को चुनौती दी थी. ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को IPC की धारा 354A और POCSO एक्ट की धारा 10 के तहत आरोपों से बरी कर दिया था. हाई कोर्ट ने उपलब्ध साबूतों की समीक्षा के बाद IPC की धारा 354A(1)(i) के तहत आरोपी को दोषी माना. जींस पहनना महिला की अपनी पसंद- दिल्ली हाई कोर्ट अब आज के मुद्दे पर बात करते है जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट ने महिला के कपड़ों को लेकर की गई जिरह पर बेहद साफ टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि कोई लड़की या महिला क्या पहनती है, यह उसकी अपनी पसंद है. उसके कपड़ों को लेकर न तो पड़ोसी, न समाज, न आरोपी और न ही अदालत में पेश होने वाले वकील कोई फैसला सुना सकते हैं. कोर्ट ने आगे कहा कि किसी महिला के कपड़ों का चुनाव न तो उसकी गरिमा को कम करता है और नहीं उसके खिलाफ किए गए गैरकानूनी व्यवहार को सही ठहराने का आधार बन सकता है. अदालत ने यह भी कहा कि यह सोच की जींस पहनने वाली महिला युवाओं को बिगाड़ सकती है, बेहद चिंताजनक और अस्वीकार्य है. पीड़िता को शर्मिंदा करने वाली जिरह पर नाराजगी कोर्ट ने पाया कि बचाव पक्ष की जिरह में पीड़िता के कपड़ों को बार-बार मुद्दा बनाया गया. यह पूछताछ मामले के लिए प्रासंगिक नहीं थी और ऐसा लगता था कि इसका इस्तेमाल पीड़िता को शर्मिंदा करने, अपमानित करने और नैतिक रूप से आंकने के लिए किया गया. हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसी सोच पर आधारित सवालों की अदालत में कोई जगह नहीं होनी चाहिए. ट्रायल जज को ऐसी जिरह को शुरुआत में ही रोक देना चाहिए था.
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